HBSE/NCERT World History धर्म सुधार

 HBSE/NCERT World History धर्म सुधार 


18वीं शताब्दी से पूर्व के विश्व की स्थिति 

1. सामंतवाद (Feudalism)
  • 1.1. परिचय  
  • 1.2. सामंतवाद का उदय एवं विकास 
  • 1.3. सामंतवाद की विशेषताएं.
    • 1.3.1. मैनर
    • 1.3.2. किसान
    • 1.3.3. राजा और सामंत
2. चर्च
  • 2.1. चर्च में भ्रष्टाचार 
3. परिवर्तनशील समय
  • 3.1. व्यापार, बड़े बड़े नगरों का विकास 
  • 3.2. उत्पादन विधि में परिवर्तनः गिल्ड (संघ)
  • 3.3. व्यापारी वर्ग के प्रभाव में वृद्धि
  • 3.4. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की दिशा में संक्रमण
  • 3.5. राजा व्यापारी सांठ-गांठ और किसान विद्रोह
4. आधुनिक युग (Modern Era)
  • 4.1. पुनर्जागरण और सुधार
  • 4.1.1. पुनर्जागरण
  • 4.1.2. सुधार आन्दोलन (Reformation)
    • 4.1.2.1  धर्म सुधार का अर्थ, उद्देश्य एवं स्वरूप
    • 4.1.2.2 आन्दोलन के कारण
    • 4.1.2.3 धर्म सुधार के प्रवर्त्तक
    • 4.1.2.4 प्रोटेस्टेन्ट चर्च का जन्म
    • 4.1.2.5 ऑग्सबर्ग की संधि
    • 4.1.2.6 काल्विनवाद
    • 4.1.2.7 लूथर और काल्विन: एक तुलना
    • 4.1.2.8 ऐंग्लिकन विचारधारा
    • 4.1.2.9 धर्मसुधार आन्दोलन की सफलता एवं इसके कारण
    • 4.1.2.10 धर्म सुधार आन्दोलन के परिणाम

4.1.2.1  धर्म सुधार का अर्थ, उद्देश्य एवं स्वरूप

16वीं शताब्दी के पूर्व यूरोप में दो चर्च थे- पूर्वी यूरोप में कट्टरपंथी चर्च (orthodox church) और पश्चिमी यूरोप में रोमन कैथोलिक चर्च। कट्टरपंथी चर्च का केन्द्र कुस्तुनतुनिया था। यह पूर्वी रोमन साम्राज्य की राजधानी थी। 1453 ई० में तुर्कों ने इस पर अधिकार कर लिया। फलतः कट्टरपंथी चर्च का प्रभाव कम हो गया। परन्तु रोमन कैथोलिक चर्च का प्रभाव ज्यों-का-त्यों बना रहा। चर्च की स्थापना उच्च आदर्शों से प्रेरित होकर मानव-कल्याण के लिए की गई थी। कालान्तर में चर्च अपने पवित्र कर्त्तव्य से विमुख हो गया। इसका नैतिक पतन हो गया।
यह शोषण का यंत्र और विलासिता का गढ़ बन गया। अतः 16वीं शताब्दी में चर्च के दोषों को दूर करने के लिए यूरोप में धर्म सुधार (Reformation) आन्दोलन चल पड़ा। 
4.1.2.2 आन्दोलन के कारण
  • पुनर्जागरण :
  • राजनीतिक कारण :
  • आर्थिक कारण :
  • चर्च के दोष :
  • वैज्ञानिक प्रगति :
  • शिक्षा का प्रसार :
  • तात्कालिक कारण :
पुनर्जागरण :
                     पुनर्जागरण ने यूरोप के अंधकार युग को समाप्त कर नए आदर्शों को जन्म दिया। इसने तार्किक प्रवृत्ति को जन्म दिया। अब रूढ़िग्रस्त और परम्परागत अंधविश्वासों का विरोध किया जाने लगा। धार्मिक कर्मकाण्डों का बना रहना कठिन हो गया। रोमन कैथोलिक चर्च के दोषों का विरोध किया जाने लगा। यह विरोध ही धर्म सुधार आन्दोलन का कारण बन गया।

राजनीतिक कारण :
                             16वीं शताब्दी तक यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों का उदय हो चुका था। इंगलैंड, फ्रांस, स्पेन, हालैंड, आस्ट्रिया आदि राष्ट्रीय राज्यों में निरंकुश राजतंत्र की स्थापना हो चुकी थी। राष्ट्रीय राज्य का प्रधान राजा था। रोमन चर्च का प्रधान पोप नहीं चाहता था कि राष्ट्रीय राज्यों में राजा प्रधान रहे। रोम का पोप सभी यूरोपीय देशों के चर्च का प्रधान होता था। वह देशीय चर्च के उच्चाधिकारियों की नियुक्ति करता था। वह अपने को धार्मिक मामलों में ही नहीं बल्कि लौकिक मामलों में भी अपने को प्रधान मानता था। अतः राष्ट्रीय राजाओं और पोप में संघर्ष होना अनिवार्य हो गया। मध्ययुगीन यूरोपीय इतिहास इसी संघर्ष का इतिहास है। किन्तु अब समय बदल चुका था। अब राजाओं की शक्ति और उनके साधनों में काफी वृद्धि हो गई थी। अब वे पोप की सर्वोच्चता स्वीकार करने के लिए तैयार न थे। राजा अपने राज्य में धार्मिक और लौकिक मामलों में अपने को सर्वोच्च समझने लगे। सरकारी मामलों में पोप के हस्तक्षेप को अनुचित और अनावश्यक बतलाया गया। चर्च अब 'राज्य के अन्दर राज्य' (state within state) नहीं रह गया। कई राष्ट्रीय राजाओं ने चर्च की संपत्ति जब्त कर ली। इंगलैंड के राजा हेनरी आठवें ने तलाक प्रश्न पर रोम से संबंध-विच्छेद कर लिया। वह अपनी रानी कैथरिक को तलाक देना चाहता था, लेकिन पोप ऐसा नहीं चाहता था। इस पर हेनरी ने रोम से अपना संबंध-विच्छेद कर धर्म सुधार आन्दोलन को जन्म दिया।

आर्थिक कारण :
                           16वीं शताब्दी तक अन्तर्राष्ट्रीय पैमाने पर व्यापार होने लगा। व्यापार-व्यवसाय के लिए पूँजी की आवश्यकता होती है। नवोदित व्यापारी वर्ग व्याज पर पूँजी निवेश पसन्द करता था। किन्तु, चर्च सूदखोरी (usury) का विरोधी था। यह सूदखोरी को अनैतिक और अधार्मिक कहता था। इस आलोचना के पीछे स्वयं चर्च का स्वार्थ निहित था। इसका कहना था कि सूद लेना पाप है, इसलिए इस पाप से छुटकारा पाने के लिए लोगों को सूद से आए हुए पैसे को चर्च में दान दे देना चाहिए। चर्च से प्रभावित होकर अनेक देशों में व्याज पर पूँजी निवेश को अवैध घोषित कर दिया गया था। इससे व्यापारियों एवं सेठ-साहूकारों को बड़ी हानि होती थी। पूँजी का संचय नहीं हो पाता था। अतः जब धर्म सुधार आन्दोलन चल पड़ा तो व्यापारियों ने भी इसका समर्थन किया।

चर्च के दोष :
                 चर्च जीवन में कई दोष आ गए थे। रोमन चर्च के प्रधान पोप को कभी सादगी, सरलता एवं पवित्रता की प्रतिमा समझा जाता था। अब वह आलसी-विलासी, धन-लोलूप एवं अनैतिक बन गया था। पोप अलेक्जेंडर छठा बड़ा भ्रष्ट था। पोप लियो दसवें ने अपने विलासमय जीवन के व्यय के पीछे चर्च की बहुमूल्य मूर्तियों को भी बेच डाला था। चर्च की आय के अनेक स्त्रोत थे। दशांश (tithe), बच्चों के नामकरण-संस्कार (baptism), दाह-संस्कार शुल्क (mortuary fee), पादरियों की वृत्ति (benefice), आदि अनेक आय-स्त्रोत थे। पाप-मोचन-पत्र की बिक्री (sale of indulgence) से भी काफी आय होती थी। पोप का कहना था कि पाप-मोचन-पत्र खरीद कर लोग अपने पापों से मुक्ति पा सकते हैं। छोटे और बड़े पादरियों में काफी भेदभाव था। पोप तथा चर्च के उच्च पदाधिकारी (कार्डिनल, आर्चविशप, विशप, एबट आदि) बड़े खुशहाल थे। दूसरी ओर, चर्च के निम्न पादरियों की स्थिति चिन्ताजनक थी। उन्हें ही चर्च-संबंधी सभी धार्मिक एवं मानव कल्याणकारी कार्यों को करना पड़ता था। किन्तु, उन्हें बहुत कम पारिश्रमिक या वेतन मिलता था। अतः वे असंतुष्ट थे तथा चर्च-व्यवस्था में परिवर्तन के समर्थक बन गए थे। यह धर्म सुधार आन्दोलन से संभव था।

वैज्ञानिक प्रगति :
                            पुनर्जागरण से चौदहवीं-पन्द्रहवीं शताब्दी में जगत् और ईश्वर सम्बन्धी वैज्ञानिक यूनानी विचारों का प्रादुर्भाव हुआ जिसने चर्च की मान्यताओं को धूमिल किया। उदाहरणार्थ, पूर्व काल में टालमी का यह विचार मान्य था कि पृथ्वी सौर-मण्डल का केन्द्र है। यह विश्वास इतना गहरा था कि जब ब्रूनों ने इसका विरोध किया, तब उसे जिन्दा जला दिया गया। जब कॉपरनिक्स ने यह सिद्ध कर दिया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है तो धर्माचार्यों ने उसे अपने निष्कर्ष वापस लेने को कहा। ऐसे ही समय विचारकों ने धार्मिक विश्वास के विपरीत यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य स्वयं अपने भाग्य का निर्माता हो सकता है। मेरिनर्स कम्पास की खोज से यूरोप के लोगों के विभिन्न गैर-ईसाई संस्कृतियों से सम्बन्ध स्थापित हुए। परिणामस्वरूप ईसाई धर्माडम्बरो का पर्दाफाश हुआ।

शिक्षा का प्रसार-
                          पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्व तक यूरोपीय शिक्षा केन्द्रों में केवल धार्मिक शिक्षा दी जाती थी। किन्तु पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप इटली और यूरोप के शेष भागों में धर्म-निरपेक्ष विषयों का अध्ययन किया जाने लगा। धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के प्रसार से व्यक्ति ईसाई धर्म की कुरीतियों को समझने लगा। यूरोप में शिक्षा के इस प्रसार में छापेखाने के प्रवेश ने बहुत योगदान दिया। 50 वर्षों के थोड़े समय में ही यूरोप में लगभग दस लाख पुस्तकें तैयार हो चुकी थीं। पुस्तकों के प्रसार से ज्ञान और नवीन विचारों का प्रसार सम्भव हुआ। बाइबिल का अनेक देशों की भाषाओं में अनुवाद होने से सामान्यजन भी ईसाई धर्म के मूल को समझने लगे। कई यूरोपीय राज्यों जर्मनी, फ्रांस और इंग्लैण्ड में नये नये विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई, जो कालान्तर में धर्म सुधार आन्दोलन के अधिकांश नेताओं की गतिविधियों के केन्द्र बने।

तात्कालिक कारण-
                            चर्च के व्यय अत्याधिक होने के कारण चर्च ने वैध व अवैध, उचित तथा अनुचित उपायों एवं साधनों द्वारा धन वसूल करना आरम्भ कर दिया। धर्म सुधार आन्दोलन का तात्कालिक कारण था-पोप के अधिकृत पदाधिकारी, टेटजेल द्वारा जर्मनी में "पाप-मोचन पत्रों" अथव 'अनुग्रह-पत्रों' (इन्डल्जेन्सेज) का विक्रय। जब सन् 1517 में टेटजेल नामक पोप का एजेन्ट जर्मनी के विटनबर्ग में 'पाप मोचन पत्रे' को खुलेआम बेचने लगा तो मार्टिन लूथर ने अपने प्रसिद्ध '95 प्रसंगों' द्वारा इसका डटकर विरोध किया और पोप के विरुद्ध विद्रोह का झण्डा खड़ा किया। लूथर ने इस तथ्य पर जोर दिया कि धन लेकर मोक्ष प्राप्त नहीं किया जा सकता है अपितु पापों से मुक्ति के लिए ईश्वर की असीम दया की आवश्यकता है। उसने 'श्रद्धा द्वारा दोष मुक्ति' का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उसका विश्वास था कि यदि मनुष्य अपने पापों के लिए खेद प्रकट करता है और ईश्वर में विश्वास रखता है तो वह पाप-मोचन पत्र के बिना भी क्षमा कर देगा।
4.1.2.3 धर्म सुधार के प्रवर्त्तक
  • जान वाइक्लिफ (1320-1384) ई०
  • जॉन हस (1369-1415) ई०
  • सेवोनारोला (1452-1488) ई०
  • इरेसमस (1466-1536) ई०
  • मार्टिन लूथर (1483-1546)
जान वाइक्लिफ (1320-1384) ई०
                                                     वाइक्लिफ ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का एक प्राध्यापक था। उसने कैथोलिक धर्म की बहुत सी परम्पराओं तथा चर्च के क्रियाकलापों की आलोचना की। उसने घोषित किया, "पोप पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि नहीं है तथा भ्रष्ट एवं विवेकहीन पादरियों द्वारा दिये जाने वाले धार्मिक उपदेश व्यर्थ हैं।" उसका कहना था कि प्रत्येक ईसाई को बाइबिल के सिद्धांतों के अनुसार काम करना चाहिए और इसके लिये चर्च या पादरियों के मार्ग निर्देशन की आवश्यकता नहीं है। वाइक्लिफ ने इस बात की वकालत की कि आम लोगों को इस बात का ज्ञान होना चाहिये कि धर्मग्रन्थ में क्या लिखा है। यह ध्यातव्य है कि कैथोलिक चर्च की भाषा अब तक लैटिन थी, जिसे आम लोग नहीं समझ पाते थे। वह जन भाषाओं में धर्मग्रंथों के अनुवाद के पक्ष में था। उसी की प्रेरणा के फलस्वरूप बाइबिल का प्रथम अंग्रेजी अनुवाद हुआ। उसने यह भी मांग की कि चर्च की विपुल धन-सम्पत्ति पर राज्य को अधिकार कर लेना चाहिये। उसके विचार एक सीमा तक क्रान्तिकारी थे, जिन्हे रूढ़ीवादी धर्माधिकारी सहन नहीं कर पाये। धर्माधिकारियों और शिक्षा शास्त्रियों दोनों ने ही उसके विचारों का विरोध किया। किन्तु वे उसके विचारों के प्रसार को रोकने में असफल रहे। उसे 'द मार्निंग स्टार आफ रिफॉर्मेशन कहा गया।

जॉन हस (1369-1415) ई०-
                                        हस बोहेमिया (चेक) का निवासी था और प्राग विश्वविद्यालय में प्रोफेसर था। उसके विचारों पर वाइक्लिफ का गहरा प्रभाव था। उसकी मान्यता थी कि एक सामान्य ईसाई, बाइबिल के अध्ययन से ही मुक्ति का मार्ग खोज सकता है ओर इसके लिए चर्च आदि के सहयोग की आवश्यकता नहीं हैं। चर्च की निन्दा और नास्तिकत्ता का प्रसार करने के आरोप में उसे जिन्दा जला दिया गया। उसके विचारों का बोहेमिया के जन-जीवन पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा।

सेवोनारोला (1452-1488) ई०-
                                                   वह फ्लोरेन्स नगर का एक विद्वान पादरी तथा राजनीतिज्ञ था। उसने पोप के राजसी ठाठ की आलोचना की तथा चर्च के क्रियाकलापों में सुधार पर जोर दिया। तत्कालीन पोप एलेक्जेण्डर षष्ठम् ने उसे अपने विचारां का प्रचार बंद करनेका आदेश दिया, जिसका उसने पालन नहीं किया। इस पर चर्च ने उसे चर्च की महान् परिषद के सम्मुख स्पष्टीकरण के लिए बुलाया और चर्च की निन्दा करने के आरोप में उसे भी जिन्दा जला दिया गया।

इरेसमस (1466-1536) ई०- 
                                       हॉलैण्डवासी इरेसमस विचारों की गहनता एवं सुन्दर लेखन शैली के कारण शीघ्र ही यूरोप में विख्यात विद्वान बन गया। लूथर के द्वारा धर्म सुधार आन्दोलन प्रारम्भ होने से पहले ही 1511 ई. में उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'द प्रेज ऑफ फौली' लिखी। इस पुस्तक के द्वारा उसने लोगों का ध्यान सहज ही चर्च की बुराईयों की तरफ खींचा। इस पुस्तक में भिक्षुओं की अज्ञानता एवं उनके सहज विश्वास की आलोचना की गयी। यद्यपि वह लूथर की तरह उग्रवादी नहीं था परन्तु अपनी पुस्तक में प्रहसनों के माध्यम से पोप की कहीं अधिक खिल्ली उड़ाई। इरेसमस ने ईसाई धर्म के मूल-सिद्धांतों के प्रचार हेतु 'न्यू टेस्टामेण्ट' का 1516 ई. में नया संस्करण निकाल कर धर्म की उत्पत्ति की व्याख्या की।
मार्टिन लूथर (1483-1546) - 
                                             लूथर का जन्म 10 नवम्बर, 1483 को जर्मनी के एक निर्धन किसान परिवार में हुआ। इरफर्ट विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करने के बाद उसने पिता की इच्छा पर कानून का अध्ययन प्रारम्भ किया। किन्तु कानून की जगह उसने धर्म शास्त्र का अध्ययन शुरू कर दिया। उसका मन उद्वेलित रहने लगा। तरह-तरह की शंकाएं उठने लगीं। विटनबर्ग विश्वविद्यालय में धर्म शास्त्र का प्रोफेसर नियुक्त हो जाने पर शंकाओं के समाधान हेतु उसे अध्ययन का और मौका मिला। 1511 ई. में उसने रोम की यात्रा की। पोप के नैतिक पतन को देखकर उसे निराशा हुई।
                       लूथर प्रारंभ में पोप का विरोधी नहीं था परन्तु 1517 ई. में अचानक एक घटना, टेटलेज को सेन्ट पीटर गिरजाघर के निर्माण हेतु क्षमा-पत्र बेचकर धन इकट्ठा करने के पोप की आज्ञा, ने लूथर को चर्च का विरोधी बना दिया। टेटजेल कहता था, "जैसे ही क्षमा-पत्रों के लिए दिये गये सिक्कों की खनक गूंजती है, उस आदमी की आत्मा, जिसके लिये धन दिया गया है, सीधे स्वर्ग में प्रवेश कर जाती है।" परन्तु ऐसी बातों पर से विश्वास उठ रहा था। क्षोभ हर ओर व्याप्त था लेकिन मार्टिन लूथर अकेला आदमी था जिसने साहस बटोरकर भोली-भाली जनता के साथ किये जा रहे मजाक और शोषण का विरोध किया। उसने कहा कि यह धर्म के मूलसिंद्धात की अवहेलना है। लूथर का विचार था कि पाप पश्चाताप से नष्ट होता है, पश्चाताप मन का विषय है और चर्च के कर्मकाण्डों से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है। लूथर ने इस प्रथा के विरोध में विटनबर्ग के कैसल गिरजाघर के प्रवेश-द्वार पर 31 अक्टूबर, 1517 को अपना विरोध-पत्र' द नाइन्टी फाईव थीसिस' लटका दिया। इन 95 स्थापनाओं अथवा कथनों में चर्च द्वारा सभी उपायों से धन एकत्र करने की आलोचना की गयी थीं। ये बातें पहले लैटिन में लिखी गयी लेकिन शीघ्र ही उनका जर्मन अनुवाद हुआ। इन स्थापनाओं की प्रतियाँ उसने अन्य नगरों में अपने मित्रों को भेजी। लूथर अभी भी चर्च के अधिकार को खुली चुनौती नहीं दे रहा था लेकिन पोप ने लूथर के विरोध का विशेष महत्व नहीं समझा।
                      लूथर ने 1519 ई. में लिपजिक में एक खुले वाद-विवाद में मनुष्य और ईश्वर के बीच पोप की सहायता को निरर्थक बताया तथा जॉन हस के विचारों को स्वीकार करने का आहवान किया। यह चर्च की निरकुंश सत्ता पर लगाया गया आक्षेप था जिसके परिणाम भी गंभीर हो सकते थे। इस बीच उसने तीन लघु पुस्तिकाएँ (पेम्फलेट) प्रकाशित किये। इन पुस्तिकाओं में उन मूलभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया जिन्हें आगे चलकर 'प्रोटेस्टेन्टवाद' के नाम से अभिहित किया गया। 'एन एड्रेस टु द नोबिल्टी ऑफ द जर्मन नेशन' (जर्मन राष्ट्र के सामन्तवर्ग के प्रति एक अपील) में उसने चर्च की अपार सम्पत्ति का वर्णन करते हुए जर्मन शासकों को विदेशी प्रभाव से मुक्त होने के लिए प्रेरित किया। 'द बेबीलोनियन केप्टिविटी ऑफ द चर्च' (चर्च की बेबीलोनियायी कैद) में उसने पोप ओर उसकी व्यवस्था पर प्रहार किया। 'द फ्रीडम ऑफ क्रिश्चियन मेंन' (एक ईसाई मनुष्य की मुक्ति) में उसने मुक्ति के सिद्धांतो का प्रतिपादन किया और ईश्वर की अनुकम्पा पर अटूट विश्वास की प्रतिष्ठा की। इन्हीं लघु पुस्तिकाओं में प्रतिपादित सिद्धांत आगे चलकर प्रोटेस्टेन्टवाद के आधारभूत तत्त्व बने।
                      लूथर के कार्यों से पोप क्षुब्ध हो गया। 1520 में पोप ने लूथर को आदेश दिया कि वह 60 दिन के भीत्तर अपने विचार वापस ले अन्यथा उसे धर्मद्रोही घोषित कर दिया जायेगा। परन्तु लूथर ने आदेश की परवाह नहीं की। उसने पोप के आदेश को एक सार्वजनिक सभा में जला दिया। अन्ततोगत्वा लूथर को धर्म से निष्कासित कर दिया। इस अवधि में उसका मित्र सैक्सनी का शासक उसका संरक्षक रहा। जर्मनी के अनेक शासक चर्च विरोधी थे। अतः लूथर को धर्म से बहिष्कृत किया गया तो उसे कोई क्षति नहीं हुई। रोम के पवित्र साम्राज्य का अध्यक्ष चार्ल्स पंचम यद्यपि पोप का समर्थक था परन्तु वह युद्धों में इतना उलझा हुआ था कि बढ़ते हुए धार्मिक असंतोष को कुचलने में असमर्थ रहा। दूसरी ओर मार्टिन लूथर ने आन्दोलन को सफल बनाने के लिए अथक प्रयास किया तथा भाषणों, लेखों एवं पत्रिकाओं द्वारा समाज के सभी वर्गों में जागृति उत्पन्न की। लोगों में जागृति का कारण केवल चर्च और संगठन के दोष ही नहीं थे बल्कि चर्च की सम्पत्ति के प्रति लालच भी था। इस जागृति में छापेखाने के आविष्कार से भी काफी मदद मिली। 1521 में जर्मनी की शाही संसद ने उसकी भर्त्सना की, किंतु जागरण का विस्तार इतना हो गया था कि अब भर्त्सना का कोई अर्थ नहीं रह गया था। इस जागरण में शहरी मध्यवर्ग के विभिन्न समूहों तथा दस्तकारों की भूमिका सबसे प्रमुख थी।
मार्टिन लूथर के विचार एवं उनका प्रसार
  • (i) उसने ईसा और बाइबिल की सत्ता स्वीकार की लेकिन पोप और चर्च की दिव्यता और निरकुंशता को नकार दिया। 
  • (ii) चर्च द्वारा निर्धारित कर्मों के स्थान पर उसने ईश्वर में आस्था को मुक्ति का साधन बताया। 
  • (iii) 'सप्त संस्कारों; में से उसने केवल तीन-नामकरण, प्रायश्चित और प्रसाद को ही माना। 
  • (iv) उसने चर्च के चमत्कार में अविश्वास व्यक्त किया। 
  • (v) किसी भी व्यक्ति को न्याय से ऊपर नहीं होना चाहिये। 
  • (vi) रोम के चर्च के प्रभुत्व का अन्त करके राष्ट्रीय चर्च की शक्ति को सबल बनाया जाना चाहिये। 
  • (vii) धर्मग्रन्थ सबके लिये हैं, सब उसका ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। 
  • (viii) चर्च के भ्रष्टाचार को रोकने के लिए पादरी लोगों को विवाह करके सभ्य नागरिकों की तरह रहने की अनुमति दी जानी चाहिये।
                            आने वाले वर्षों में मार्टिन लूथर एक स्वतन्त्र चर्च स्थापित करने की बात कहता रहा। उसने कैथोलिक चर्च की श्रेणीबद्ध व्यवस्था को स्वीकार किया। जर्मन भाषा को चर्च के कार्य-व्यवहार की भाषा बनाया। मठवाद का अंत किया। धरती पर ईश्वर के प्रतिनिधि के रूप में पुरोहितों के विशेष पद को समाप्त किया। दैववाद के सिद्धान्तों एवं धर्मग्रन्थों की सत्ता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई। तीर्थयात्रा एवं अवशेषों की पूजा को गौण माना। कुल मिलाकर लूथर धर्म को एक सरल रूप देने में लगा रहा।
                    आगामी कुछ वर्षों में समस्त मध्य व उत्तरी जर्मन रियासतों में लूथर के विचारों व शिक्षाओं का अपूर्व प्रसार हुआ। तत्कालीन सामाजिक तथा राजनीतिक अशान्ति का पूर्ण लाभ उठाते हुए लूथर ने पोप व सम्राट दोनों की उपेक्षा की। उसके सिद्धान्त बड़ी शीघ्रता से स्वीकृत व मान्य होने लगे। लूथर का धर्म सुधार आन्दोलन वस्तुतः लोकप्रिय व राष्ट्रीय आन्दोलन था। उसने सदाचारी ईसाइयों को अपने धर्म सुधार आन्दोलन की ओर आकृष्ट किया। लूथरवादी शिक्षाओं ने जर्मनी के देशभक्तों को भी अत्याधिक प्रभावित किया क्योंकि वे विदेशी पुरोहितों की शोषणात्मक नीति का अन्त करना चाहते थे। उसके समर्थकों ने कैथोलिक चर्च के विरुद्ध विद्रोह किया, चर्च की जागीरें व जायदाद छीन ली तथा कैथोलिक पूजा-उपासना का परित्याग कर दिया। कैथोलिक मठ नष्ट-भ्रष्ट कर दिये गये। पोप की राजनीतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ता अमान्य की गयी। 1524 ई. में समस्त जर्मनी में लूथरवादी शिक्षाओं का प्रचास व पालन अवश्यम्भावी प्रतीत होने लगा, परन्तु इसी समय अग्रलिखित कुछ ऐसी घटनाएँ घटित हुईं जिनके परिणामस्वरूप लूथरवादी आन्दोलन काफी सीमित हो गया। अन्ततोगत्वा उत्तरी जर्मनी राज्यों में ही उसका प्रभाव रहा।
                        मार्टिन लूथर के विचारों के तेजी से पनपने का एक अप्रत्याशित परिणाम यह निकला कि जर्मनी में कृषकों के विद्रोहों की शुरूआत हो गई। कार्ट्सतेत, टॉमस मुत्ज़र जैसे लोगों के नेतृत्व में लूथरवाद ने अधिक उग्र-सुधारवादी रूप धारण कर लिया था। इस पृष्ठभूमि में केन्द्रीय तथा दक्षिण-पश्चिमी जर्मनी में 1525 ई. में महान् कृषक युद्ध हुए। वे कृषिदास-प्रथा, सामंती-कर, धार्मिक कर, वन संपदा के उपयोग पर नियन्त्रण आदि के प्रचलन के विरुद्ध आन्दोलनरत थे। साथ ही वे पादरियों के निर्वाचन की भी माँग कर रहे थे। किसानों की यह मान्यता थी कि लूथर धार्मिक स्वतन्त्रता के साथ-साथ सामाजिक ओर आर्थिक स्वतन्त्रता का भी समर्थक होगा। अतः वे अपने आन्दोलन के समर्थन में लूथर से काफी आशा कर रहे थे। परन्तु इसके विपरीत लूथर ने विद्रोह को दबाने में शासकों एवं जींदारों का साथ दिया। लूथर ने कड़े शब्दों में किसानों की भर्त्सना की ओर सामंतों से कहा कि वे उन्हें पागल कुत्तों की भाँति मार डालें। ऐसा अनुमान है कि 50,000 किसानों की मौत के बाद विद्रोह को दबाया जा सका था। कुल मिलाकर लूथर का आन्दोलन, सामाजिक-आर्थिक आन्दोलन के रूप में उग्र-सुधारवादी नहीं था। इसका एक प्रमुख परिणाम यह निकला कि लूथरवाद उत्तरोत्तर निम्नवर्गीय शक्तियों की सहानुभुति खोता गया और क्रमशः जर्मन-नरेशों पर अधिकाधिक आश्रित होता गया। लूथर के रूढ़िवादी दृष्टिकोण के कारण धर्मसुधार की धारा को आवृत्ति ताजगी मिलना भी बंद हो गया।
4.1.2.4 प्रोटेस्टेन्ट चर्च का जन्म
                                                 धार्मिक विवाद के हल के लिए 1526 ई. में पवित्र रोमन साम्राज्य की पहली सभा स्पीयर में हुई। चूंकि इसमें जर्मनी के शासकगण, लूथरवाद व कैथोलिक दलों में विभक्त हो गये थे, अतः यह सभा धर्म सुधार आन्दोलन के सम्बन्ध में कोई स्थायी समाधान न कर सकी। इस सभा ने धार्मिक समस्या के समाधान या धर्म निश्चय का उत्तरदायित्व स्थानीय शासकों पर छोड़ दिया और यह निश्चय किया गया कि प्रत्येक राज धर्म के मामलें में ऐसा मार्ग अपनायेगा कि वह उपने आचरण के लिए ईश्वर और सम्राट के प्रति उत्तरदायी होगा। 1529 ई. में स्पीयर में ही एक दूसरी सभा हुई। किन्तु उस सभा ने भी सुधार आन्दोलन को मान्यता प्रदान नहीं की तथा नये सुधार आन्दोलन के विरुद्ध कई कठोर निर्देश पारित किये। इस सभा के एक पक्षीय निर्णयों के विरुद्ध लूथरवादी शासकों व समर्थकों ने तीव्र विरोध किया। इस विरोध या प्रतिवाद (प्रोटेस्ट) के कारण इस सुधार आन्दोलन का नाम 'प्रोटेस्टेन्ट पड़ा। औपचारिक तौर पर यह विरोध 16 अप्रैल, 1529 को हुआ। इस प्रकार प्रोटेस्टेन्ट अनुयायियों ने कैथोलिक चर्च व पोप के सार्वभौमिक अधिकारों को अस्वीकार कर दिया। सन् 1530 में प्रोटेस्टेन्ट धर्म का सैद्धान्तिक रूप निरूपित किया गया जिसमें मार्टिन लूथर के सिद्धान्त को मान्यता मिली।
4.1.2.5 ऑग्सबर्ग की संधि
                                          सम्राट चार्ल्स पंचम् अन्य समस्याओं में उलझा हुआ था। 1530 ई. के बाद उसने लूथरवाद को दबाना चाहा। उसने ऑग्सबर्ग में एक सभा बुलायी एवं वहाँ प्रोटेस्टेन्ट लोगों को विधिपूर्वक अपने सिद्धान्तों को पेश करने की आज्ञा दी। अतः इस सभा में प्रोटेस्टेन्टों ने एक दस्तावेज के रूप में अपने सिद्धान्त रखे। इस दस्तावेज को 'ऑग्सबर्ग' की स्वीकृति' कहते हैं परन्तु चार्ल्स पंचम् ने 'ऑग्सबर्ग की स्वीकृति' को अमान्य कर दिया। किन्तु लूथरवादियों के प्रभाव तथा स्वयं की बाह्य परिस्थितियों के कारण उसने 1532 ई. में विराम-संधि की, जो 1546 ई. तक चली। बाह्य आपत्तियों व घरेलू समस्याओं से छुटकारा पाने के उपरान्त चार्ल्स पंचम् ने प्रोटेस्टेन्टों का समूल दमन करने का निश्चय किया। इसी निश्चय के परिणामस्वरूप जर्मनी में 1546 ई. से 1555 ई. तक गृह-युद्ध छिड़ गया। दीर्घकालीन गृह-युद्ध के भयंकर दुष्परिणामों से विवश होकर प्रिंस फर्डिनेन्ड ने जर्मनी के प्रोटेस्टेन्टों के साथ सन् 1555 में ऑग्सबर्ग की संधि की। 
इस संधि के अनुसार 
  • (1) हर शासक को (जनता को नहीं) अपना और अपनी प्रजा का धर्म चुनने की स्वतंत्रता दे दी गयी। 
  • (ii) 1552 ई. से पहले प्रोटेस्टेन्ट लोगों ने चर्च की जो जायदाद अपने अधिकार में ले ली थी, वह उनकी मान ली गयी 
  • (iii) लूथर के अतिरिक्त अन्य किसी को मान्यता नहीं दी गयी। 
  • (iv) कैथोलिक क्षेत्रों में बसने वाले लूथरवादियों को धर्म-परिर्वतन के लिए विवश नहीं किया जायेगा। 
  • (v) धार्मिक आरक्षण के सिद्धान्त के अनुसार यदि कोई कैथोलिक धर्म परिर्वतन करता है तो उसे पद से सम्बधित सभी अधिकारों का परित्याग करना होगा।
इन शर्तों ने एक हद तक धार्मिक संघर्ष को सुलझाया, पर बहुत त्रुटिपूर्ण ढंग से। संधि में व्यक्ति को नहीं शासक को धार्मिक स्वतंत्रता दी गयी थी जो बहुत दिनों तक मान्य नहीं हो सकती थी। इस संधि द्वारा सिफ्र लूथरवाद को ही कानूनी मान्यता दी गयी परन्तु अन्य प्रोटेस्टेन्ट सम्प्रदायों (जैसे ज्विग्लीवाद, काल्विनवाद) को कोई मान्यता नहीं मिली। यह संधि धार्मिक कलह का निवारण न कर सकी ओर इस समस्या का निदान करीब-करीब एक सौ वर्ष बाद वेस्टफेलिया की संधि के साथ हुआ। ऑग्सबर्ग की संधि की कमियों के बावजूद जर्मनी सोलहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में युद्धों से बचा रहा।

4.1.2.6 काल्विनवाद

                              लूथरवाद के समान ही यूरोप के दूसरे भागों में धर्म-सुधार आन्दोलन प्रारंभ हुए। इनमें स्विट्जरलैण्ड में काल्विनवाद लूथरवाद से भी सशक्त विचारधारा थी। इसका प्रणेता था-हुलड्रीक जिंवगली। ज्विगली (1484-1531)-ज्विगली का जन्म 1484 ई. में स्विट्जरलैण्ड में हुआ था। उसने धर्म-ग्रंथों का विशद् अध्ययन किया था। वह भी क्षमा-पत्रों का विरोधी था। ज्विगली द्वारा बलात् धर्म परिवर्तन कराने के कारण स्विट्जरलैण्ड में गृहयुद्ध हो गया। अन्त में समझौता हुआ जिससे अन्तिम अधिकार स्थानीय सरकारों को मिल गया। फलतः आज भी जर्मनी की तरह स्विट्जरलैण्ड में कैथोलिक एवं प्रोटेस्टेन्ट दोनों ही है।

काल्विन (1509-1564)- 
                              ज्विगली की विचारधारा को उसकी मृत्यु के पाँच वर्ष पश्चात् फ्रांस में जॉन काल्विन ने व्यवस्थित करके सशक्त रूप में न केवल स्विट्जरलैण्ड में बल्कि बाहर भी स्थापित किया। जॉन काल्विन का जन्म 1506 ई. में फ्रांस में हुआ था। काल्विन को दृढ़ विश्वास था कि उसे अपने विचार अकाट्य तर्कों के आधार पर रखने होंगे, तभी वह कैथोलि चर्च का सफल विरोध कर सकेगा। उसने चर्च से सम्बन्ध तोड़ लिया और अपने विचार लोगों के सामने रखने शुरू कर दिये। उसकी युवावस्था के बावजूद उसके प्रशंसक तेजी से बढ़ने लगे। फ्रांस के शासक फ्रांसिस ने उस पर प्रतिबंध लगाना चाहा लेकिन इससे उसकी मदद ही हुई और वह फ्रांस छोडकर स्विट्जरलैण्ड चला गया, जहाँ मृत्यु पर्यन्त रहा। वहाँ वह ज्विग्ली के सम्पर्क में आया। वहीं कैथोलिक चर्च के समानान्तर प्रोटेस्टेन्ट चर्च के सिद्धान्त का प्रतिपादन करने के लिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक 'ईसाई धर्म के आधारभूत सिंद्धान्त' (इन्स्टीट्यूट ऑफ क्रिश्चियन रिलिजन) लिखी। यह अब तक की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक थी। इतने तर्कपूर्ण और विद्वतापूर्ण सिद्धान्तों का प्रतिपादन इससे पूर्व किसी ने नहीं किया था। इसमें उसने ज्विगली और लूथर के विचार लिए, वर व्याख्या सर्वथा उसकी अपनी थी। पुस्तक काफी लोकप्रिय हुई। इसमें उसने सुधारवादी तथा कैथोलिक दोनों चर्चों की तुलना की। यहां यह स्मरणीय है कि लूथरवाद में पोप और संगठन के विरोध के अतिरिक्त धर्म के कर्मकांडों के विषय में उल्लेखनीय परिवर्तन का प्रस्ताव नहीं था परन्तु काल्विन धर्मशास्त्र के बाहर किसी भी कर्मकाण्ड को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं था।
             काल्विन में अद्भुत संगठन-शक्ति थी। उसने जेनेआ नगरवासियों को संगठित किया और उन्हें धार्मिक तथा आर्थिक स्वतन्त्रता दिलायी। शीघ्र ही जेनेआ एक धर्म प्रधान नगर-राज्य बन गया जिसका वह सर्वोच्च नेता और नियन्ता था। उसने एक विशुद्ध नैतिकवादी व्यवस्था कायम की। जरा सी चारित्रिक कमजोरी पर वह कठोर दण्ड देता था। वह स्वयं सादा जीवन व्यतीत करता था। धीरे-धीरे प्रोटेस्टेन्ट लोगों में उसकी वह धाक हो गयी, जो कैथोलिक लोगों में पोप की थी। उस 'प्रोटेस्टेन्ट पोप' कहा जाने लगा। इतनी सफलता के पीछे उसके सिद्धान्त थे। मनुष्य की मुक्ति न कर्म से हो सकती है न आस्था से, वह तो बस ईश्वर के अनुग्रह से ही हो सकती है। बाइबिल को ही मुक्ति का एकमात्र उपाय माना। व्यक्ति और ईश्वर के बीच कोई माध्यम नहीं माना। संस्कारों का महत्व कम करके व्यक्ति के पवित्र आचरण एवं नैतिक अनुशासन पर बहुत बल दिया। काल्विनवाद विशेष रूप से मध्यवर्ग में काफी लोकप्रिय हुआ। यह स्विट्जरलैण्ड एवं फ्रांस में धीरे-धीरे फैलने लगा। लूथर के कार्यक्षेत्र जर्मनी में भी काल्विनवाद का प्रसार हुआ और अन्त में उसे मान्यता भी मिली। उत्तरी नीदरलैण्ड एवं स्कॉटलैण्ड में इस विचारधारा का तेजी से प्रसार हुआ। इस तरह सत्रहवीं शताब्दी आते-आते अपने कट्टर अनुशासन के कारण काल्विनवाद सारे यूरोप में फैल गया, जबकी लूथरवाद मुख्यतया जर्मनी का राष्ट्रीय धर्म ही रहा।

4.1.2.7 लूथर और काल्विन: एक तुलना

दोनों ने करीब-करीब एक ही समय कैथेलिक चर्च का विरोध कर पृथक् सम्प्रदाय खड़े किये। दोनों ने ईसा मसीह ओर बाइबिल को पूर्णतः स्वीकार किया। लेकिन पोप की सत्ता को नकारा। दोनों ने विशेषकर मध्यवर्ग को प्रभावित किया। दोनों ने आडम्बर का विरोध किया लेकिन उनके सुधार एवं इसके तरीके भिन्न-भिन्न थे-
  • (i) लूथर चर्च को बिना पूरी तरह नकारे जर्मनी के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए थोड़े से परिवर्तन करके संतुष्ट रहा जबकि काल्विन अधिक परिवर्तन का पक्षधर रहा।
  • (ii) लूथर राज्य और धर्म के बीच स्पष्ट रेखा नहीं खीच सका लेकिन काल्विन ने दोनों के कार्यक्षेत्र में स्पष्ट विभाजन किया।
  • (iii) लूथर चमत्कारों को प्रतीक के रूप में स्वीकार करने को तैयार था किन्तु काल्विन ने चमत्कारों को बिल्कुल नकार दिया।
  • (iv) लूथर आस्था को मुक्ति का आधार मानता था। काल्विन के लिए कर्म या आस्था से कोई फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि व्यक्ति की नियति पहले से ही निश्चित होती है।
  • (v) लूथर ने अपने अनुयायियों के चरित्र एवं आचार-व्यवहार पर विशेष ध्यान नहीं दिया लेकिन काल्विन ने चारित्रिक अनुशासन को अत्याधिक महत्व दिया।
4.1.2.8 ऐंग्लिकन विचारधारा
                                          जर्मनी और स्विट्जरलैण्ड की तुलना में इंग्लैण्ड में धर्म सुधार आन्दोलन के विकास में चर्च और संगठन के धार्मिक दोषों के स्थान पर राजनीतिक महत्वाकांक्षा ज्यादा बलवती थी। सोलहवीं शताब्दी में एक छोटे से किन्तु महत्वपूर्ण प्रश्न ने इंग्लैण्ड में एंग्लिकन विचारधारा को जन्म दिया। प्रश्न ट्यूडर वंश के शासक हेनरी अष्टम् (1500-1547) से सम्बन्धित था। हेनरी के कोई पुत्र न था। यह बहुत महत्वपूर्ण नहीं था लेकिन हेनरी को कुछ दिनों से अपनी प्रमुख परिचारिका एन बोलिन से प्यार हो गया था और वह उसे अपनी पत्नी बनाना चाहता था। यह तभी सम्भव था जब उसका अपनी पत्नी कैथरिन से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता, किन्तु यह मुश्किल था। जब पोप ने हेनरी की बात नहीं मानी, तो हेनरी ने खुलकर विरोध करने का निर्णय लिया। सदियों से चले आ रहे पोप के हस्तक्षेप और आर्थिक हानि के कारण असन्तुष्ट इंग्लैण्ड को पोप विरोधी नीति अपनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई। सबसे पहले हेनरी ने रोम जाने वाले धन पर प्रतिबन्ध लगा दिया तथा फिर क्रेनमर को कैन्टरबरी का बिशप बनाया। फिर उसने अपने तथा कैथरिन के सम्बन्ध विच्छेद की आज्ञा घोषित करवायी और एन से विवाह कर लिया। अब पोप के लिए भी उसके विरुद्ध कदम उठाना अनिवार्य हो गया था। अतः उसने हेनरी को धर्मच्युत कर दिया। हेनरी ने भी 1534 ई. में पोप से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया और इंग्लैण्ड के शासक को 'इंग्लैण्ड के चर्च का सर्वोच्च अधिकारी' घोषित किया। इस प्रकार कैथोलिक चर्च से एक झटके में सम्बन्ध टूट गया।
                                    हेनरी की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी एडवर्ड अष्टम् ने प्रोटेस्टेन्ट विचारधारा को आगे बढ़ाया। इसके काल में 'बुक आफ कॉमन प्रेयर' (सामान्य प्रार्थना पुस्तक) प्रकाशित हुई, जिसमें 42 सिद्धान्तों की घोषणा की गयी। इसमें प्रोटेस्टेन्ट विचारों को स्थापित किया गया। एडवर्ड की मृत्यु के बाद उसकी बहिन मेरी ट्यूडर के समय कैथोलिक चर्च को फिर से मान्यता दी गयी लकिन विरोधी कानूनों के बावजूद उसके जीवनकाल में प्रोटेस्टेन्ट विचारधारा फैलती रही। मेरी के पश्चात् एलिजाबेथ गद्दी पर बैठी। एलिजाबेथ धर्म का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए करना चाहती थी। उसके शासनकाल में आंग्ल-धर्म का अन्तिम स्वरूप निश्चित हुआ। '42 सिद्धान्तों' को थोड़ा संशोधित करके 39 सिद्धान्तों' के नाम से लागू किया गया। ऐग्लिकन चर्च को वैधानिक सत्ता प्रदान करने के लिये 'सर्वोच्चता और एकरूपता का कानून' पास किया गया।
                         प्रोटेस्टेन्टवाद को धीरे-धीरे इंग्लैण्ड की जनता ने स्वीकार कर लिया। यद्यपि कुछ विरोध अवश्य हुआ किन्तु एलिजाबेथ की योग्यता एवं दूरदर्शिता की वजह से इंग्लैण्ड का राष्ट्रीयचर्च स्थायी साबित हुआ। इस प्रकार सोलहवीं शताब्दी के अंत तक इंग्लैण्ड में एक ऐसे राष्ट्रीय चर्च की स्थापना हुई जो कर्मकाण्ड में रोमन और धर्मशास्त्रीय संर्दभ में काल्विनवादी था।

4.1.2.9 धर्मसुधार आन्दोलन की सफलता एवं इसके कारण
                                                                                       मार्टिन लूथर ज्विगली तथा काल्विन के प्रयत्नों से यूरोप में धर्म-सुधार आन्दोलन चल पड़ा और कई देशों में सुधारकों के सिद्धांत के अनुसार चर्च के संगठन में परिवर्तन किये गए। फ्रांस और स्पेन को छोड़कर यूरोप के अधिकांश देशों में प्रोटेस्टेन्ट धर्म जड़ पकड़ने लगा। इंग्लैण्ड, स्कॉटलैण्ड, नावें, स्वीडन तथा उत्तरी जर्मनी के राज्य पोप के खिलाफ उठ खड़े हुए। इन देर्शा में प्रोटेस्टेन्ट धर्म कायम हुआ तथा स्वतन्त्र राष्ट्रीय चर्चों की स्थापना हुई। इंग्लैण्ड में प्रोटेस्टेन्ट धर्म के प्रचार में वहाँ के शासक हेनरी अष्टम् का योगदान उल्लेखनीय रहा। वह पोप से अलग होकर इंग्लैण्ड के चर्च का सर्वेसर्वा बन गया।
लूथर एवं काल्विन को वह सफलता प्राप्त हुई जो मूल धर्म प्रचारकों वाइक्लिफ एवं हस को प्राप्त न हो सकी थी। इसके कई कारण थे। वाइ‌क्लिफ एवं हस ने लोगों को सामाजिक असमानता के विरुद्ध भड़काया था जिससे अनेक लोग इनके विरोधी हो गये थे किन्तु लूथर एवं काल्विन ने यह गलती नहीं की। लूथर ने किसानों द्वारा विद्रोह करने पर उनको अपना समर्थन नहीं दिया। उसने तो इसकी निन्दा तक की। अतएव सुविधा प्राप्त वर्ग उनके विरोधी न होकर सहायक हो गए ओर धर्म सुधार में उनकी सहायता की। धर्म सुधार आन्दोलन के सफल होने का दूसरा कारण यह था कि लूथर एवं काल्विन ने राष्ट्रीयता की भावना को पोप की सर्वोपरिता के विरुद्ध उभारा। उनकी दृष्टि में किसी राज्य के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं धार्मिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप अनुचित था। राज्य आंतरिक मामलों में सार्वभौम है ऐसी इन सुधारकों की धारणा थी। अतः किसी भी देश के धर्म पर विदेशी पोप की सत्ता को इन्होंने अनुचित ठहराया। इन विचारों का यह परिणाम हुआ कि शासकगण पोप के नियन्त्रण से मुक्त होने के लिए अधिक जागरूक एवं सचेष्ट हो गये। उन्होंने धर्म सुधारकों को प्रोत्साहन एवं प्रश्रय देना प्रारम्भ किया। चर्च में जमा सम्पत्ति पर राष्ट्र के अधिकर की अवधारणा ने शासकों को धर्म सुधार आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिये प्रेरित किया। इस आन्दोलन की सफलता का तीसरा कारण यह था कि अब चर्च की उपयोगिता घट गई थी। पुनर्जागरण के पश्चात् शिक्षा का कार्य स्वतंत्र रूप से होने लगा था। बदली हुई सामाजिक एवं वैचारिक परिस्थितियों ने भी धर्म सुधार आन्दोलन को बल प्रदान किया।

4.1.2.10 धर्म सुधार आन्दोलन के परिणाम
  • (1) प्रतिवादी धर्म सुधार आन्दोलन सोलहवीं शताब्दी के धर्म सुधार आन्दोलन तथा प्रोटेस्टेन्टों की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि अपने स्थायित्व के लिए रोमन कैथोलिक चर्च में भी सुधार आवश्यक है। अतः अपनी सुरक्षा की दृष्टि से कैथोलिक मतावलम्बियों ने भी सुधार आन्दोलन का सूत्रपात किया, जिसे प्रतिवादी या प्रतिवादात्मक धर्म सुधार आन्दोलन कहा गया है। इस आन्दोलन का प्रमुख उद्देश्य चर्च के संगठन एवं कार्य-विधि सम्बद्ध सिद्धान्तों में परिवर्तन लाना, धर्म सिद्धान्तों की व्याख्या और धर्म प्रचार का कार्य करना था। इसके लिए विविध उपाय काम में लाये गए-
    • (क) ट्रैन्ट कौन्सिल इटली के ट्रैन्ट नामक स्थान पर 1545 में चर्च की एक परिषद् बुलायी गयी। इसकी बैठकें समय-समय पर अठारह वर्षों तक होती रहीं। परिषद् में अनेक कैथोलिक विद्वानों ने भाग लिया तथा चर्च में सुधार लाने के लिए अनेक महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये
      • (i) भविष्य में चर्च का कोई पद किसी को नहीं बेचना।
      • (ii) सभी बिशपों को अपने कर्त्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वाह करना होगा।
      • (iii) पादरियों को प्रशिक्षित किया जायेगा।
      • (iv) जहाँ आवश्यक हो जन-भाषा में उपदेश देना।
      • (v) पादरियों को कठोर एवं सरल जीवन बिताने का निर्देश दिया गया।
सुधारों की घोषणा के साथ ही ट्रैन्ट की परिषद् ने कैथोलिक धर्म के सिद्धान्तों की पुष्टि व व्याख्या भी की। यह घोषित किया गया कि पोप कैथोलिक चर्च का प्रधान है तथा केवल चर्च को ही धर्म ग्रन्थों की व्याख्या का अधिकार है।

ट्रैन्ट कोन्सिल के कार्यों एवं निर्णयों से चर्च में आत्म-विश्वास जागा। जिन बुराइयों के कारण चर्च पर प्रहार हुआ था, उनके दूर करने की व्यवस्था होने से चर्च की पुरानी गति लौट आयी। यही कारण है कि ट्रैन्ट की परिषद् का कैथोलिक चर्च के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है।

  • (ख) जैसुइट संघ कैथोलिक चर्च को नया जीवन प्रदान करने वालों में इग्नेशियस लायोला का स्थान महत्वपूर्ण है। स्पेन निवासी लोयोला एक बहादुर सैनिक था। युद्ध में आहत लोयोला ने अपना सारा जीवन चर्च को समर्पित कर दिया। लोयोला ने 1534 ई. में जैसुइट संघ की स्थापना की। इस संस्था का पूरा संगठन सैनिक आधार पर था। इसके हर सदस्य को कठोर अनुशासन में रहना होता था तथा दीनता, पवित्रता, आज्ञापालन और पोप के प्रति समर्पण की शपथ लेनी पडती थी। यह संघ अपने अनुयायियों को केवल पवित्र जीवन के लिए ही नहीं, चर्च की रक्षा एवं प्रसार के लिए भी तैयार करता था।
  • जैसुइट लोगों का सबसे महत्वपूर्ण कार्य विदेशों में धर्म प्रचार करना था। इसके प्रचारकों ने यूरोप के बाहर चीन, भारत, जापान, अमेरिका आदि में कैथोलिक धर्म का प्रचार किया। इस संघ ने मुस्लिम देशों में भी प्रचार किया।
  • (ग) इन्क्वीजिशन प्रोटेस्टेन्ट धर्म की प्रगति को अवरुद्ध करने के लिए जो संस्था सबसे शक्तिशाली व प्रभावपूर्ण सिद्ध हुई, वह थी-इन्क्वीजिशन। यह एक विशेष धार्मिक अदालत थी। सन् 1542 में पोप पाल तृतीय ने रोम में इस संस्था को पुनर्जीवित किया, जो सर्वोच्च अधिकारों से युक्त थी। नास्तिकों को पता लगाने, उनका कठोर दमन करने, कैथोलिक चर्च के आदेशों को बलपूर्वक लागू करने, धर्म विरोधियों व विद्रोहियों को कुचल देने, दूसरे देशों से भेजी हुई धर्म सम्बन्धी अपीलें सुनने इत्यादि उद्देश्यों से सर्वोच्च धार्मिक न्यायालय क स्थापना की गयी। प्रोटेस्टेन्टों के विरुद्ध इस न्यायालय ने कठोर कदम उठाये। इसका तात्कालिक प्रभाव कैथोलिक चर्च के प्रसार में अवश्य हुआ। किन्तु कालान्तर में इस न्यायालय ने चर्च को बदनाम किया।
  • उक्त सभी प्रयासों से लगभग सोलहवीं शताब्दी के मध्य से कैथोलिक चर्च का कायाकल्प आरम्भ हुआ और चर्च सुधारवादी दबाव से मुकाबला करने के लिये सन्नद्ध हो गया।
  • (2) ईसाई एकता का अंत धर्म सुधार आंदोलन के फलस्वरूप कैथोलिक ईसाई जगत् में दरार पड़ गयी। सुधारवादियों ने कैथोलिक चर्च से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया। किन्तु सुधारवादी भी लूथरवाद, काल्विनवाद, ऐग्लिकनवाद आदि शाखाओं में बैंट गये।
  • (3) असहिष्णुता का विकास प्रोटेस्टेन्टवाद के उदय के साथ ही कैथोलिकों और प्रोटेस्टेन्टों के बीच पारस्परिक वैमनस्य उत्पन्न हो गया। ये परस्पर एक दूसरे का मूलोच्छेदन करना चाहते थे। परिणामस्वरूप घृणा एवं शत्रुता की भावना बढ़ती गयी। धर्म को लेकर पहला युद्ध हालैण्ड में हुआ। 1560 से लेकर 1585 ई. की अवधि में आठ धार्मिक युद्धों ने फ्रांस को तहस-नहस कर डाला। 1560 से 1630 तक का काल डाकिनी आखेट इतिहास का एक बुरा समय था। जादूगरनियों (डाकिनियों) को खोजकर जीवित जला देने की इस प्रथा ने पागलपन का रूप धारण कर लिया था। शत्रुतापूर्ण घृणा तीस वर्षीय युद्ध के काल (1618-1648 ई.) में चरम सीमा पर पहुँच गयी। धार्मिक असहिष्णुता ने एक लम्बे समय के लिए यूरोप की शान्ति को भंग रखा।
  • (4) व्यक्ति की महत्ता का विकास धर्म सुधार आन्दोलन ने ईश्वर के साथ प्रत्येक व्यक्ति के सीधे सम्बन्ध को स्थापित कर व्यक्ति की स्वतन्त्र अस्मिता के विकास में योगदान दिया। प्रत्येक व्यक्ति को बाइबिल पढ़कर स्वयं उसकी व्याख्या करने पर बल दिया गया। व्यक्ति पर धर्म का प्रभाव कम होने से व्यक्ति को महत्व प्राप्त हुआ। अब उसके चिन्तन के आयाम चारों दिशाओं में अपने पैर पसार सकते थे। धर्म का बन्धन ढीला पड़ने से मानव का व्यक्तित्व निखरने लगा।
  • (5) शासकों की शक्ति का विकास धर्म सुधार आन्दोलन के परिणामस्वरूप शासकों की शक्ति बढ़ी। स्केन्डेनेविया, जर्मनी, इंग्लैण्ड, स्विट्जरलैण्ड, हॉलैण्ड आदि राज्यों में शासकों ने धार्मिक मामलों में नियन्त्रण का अधिकर प्राप्त करके और उसी के साथ चर्च की जमीनों को अधिकृत करके अपनी शक्ति एवं सम्पत्ति दोनों में वृद्धि की। कैथोलिक देशों में भी राजाओं ने पोप की कठिनाइयों का लाभ उठाते हुए बहुत-सी सुविधाएँ प्राप्त कर लीं, जिसके फलस्वरूप चर्च के मामले में उन्हें पहले से अधिक शक्ति प्राप्त हो गयी।
  • (6) वाणिज्य-व्यापार को प्रोत्साहन पुनर्जागरण युग से सामन्तवादी व्यवस्था की समाप्ति और व्यापार की प्रगति से एक समृद्ध मध्यम वर्ग का उदय हुआ, जसकी रूचि भौतिक रूप से ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करने में थी, लेकिन परम्परागत ईसाई धर्म में धन संचय को हेय दृष्टि से देखा जाता था तथा चर्च सूद और मुनाफे का विरोधी था। इसलिए धर्म सुधार आन्दोलन की प्रवृत्ति इस वर्ग के लिये रुचिकर थी। धर्म सुधारकों द्वारा सूद एवं मुनाफे को उचित बताने से इस वर्ग को प्रोत्साहन मिला। इसके अतिरिक्त कैथोलिक चर्च के कमजोर हो जाने से चर्च और मठों की भूमि एवं सम्पत्ति में मध्यम वर्ग को सबसे ज्यादा लाभ मिला। इस मध्यम वर्ग ने व्यापार एवं वाणिज्य को बढ़ावा दिया।
  • (7) राष्ट्रीय भाषा और साहित्य का प्रचार-प्रसार धर्म सुधार आन्दोलन का एक परिणाम यह भी हुआ कि लोक भाषाओं एवं साहित्य का विकास हुआ। लूथर ने स्वयं ही बाइबिल का जर्मन में अनुवाद किया। धर्म-सम्बन्धी अनेक पर्चे तथा लेख, उसने अपनी मातृभाषा में लिखे एवं प्रकाशित कराये। अन्य देशों में भी जहाँ नये मत को प्रधानता मिली, वहाँ की लोकभाषा में धर्म-सम्बन्धी साहित्य अनूदित एवं प्रसारित हुआ। अब तक लैटिन को जो प्रतिष्ठा प्राप्त थी वह अब लोकभाषाओं को भी मिलने लगी। नवीन धर्म प्रचारकों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा का प्रसार कार्य किया जिसके परिणामस्वरूप लोगों में भी अपनी मातृभाषा के प्रति श्रृद्धा की भावना का विकास हुआ।

संक्षेप में, यह कहा जा सकता है कि धर्म सुधार आन्दोलन उस अभिव्यक्ति का एक परिणाम था, जो पन्द्रवीं शताब्दी के अन्त एवं सोलहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में संघर्षों तथा उथल-पुथल के रूप में यूरोप में दिखाई दे रहा था। धर्म के क्षेत्र में संघर्ष होने का एक प्रमुख करण यह भी था कि धर्म की ही जकड़ सबसे अधिक व्यापक और जीवन्त थी। दीर्घकाल से अपनी सीमाओं का अतिक्रमण कर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को आक्रांत करने वाले चर्च का स्वरूप बदलने का समय आ गया था। धर्म सुधार आन्दोलन धर्म के मूल स्वरूप के लिए चुनौती नहीं था। विरोध केवल व्यवहार एवं कार्यान्वयन का था। सुधारवादी सम्प्रदाय केवल धार्मिक कारणों से ही अलग नहीं हुए अपितु आर्थिक ओर राजनीतिक कारणों ने भी बहुत बड़ी भूमिका अदा की। धर्म सुधार आन्दोलन ने उन प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, जिसका आधुनिक युग के संदर्भ में महत्व रहा। अब मनुष्य के सोचने पर कोई सीमा न रह गयी थी और वह जीवन के सभी पहलुओं में प्रयोग करने को स्वतन्त्र था।

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