HBSE/NCERT History model test paper for annual exam Paper-II

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HARYANA BOARD OF SCHOOL EDUCATION, BHIWANI

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इतिहास - 12
रोल नं. --------------------------                                                                                  समय : 3:00 घंटे
                                                                                                                                पूर्णांक : 80

निर्देश :
इस प्रश्न-पत्र में कुल 36 प्रश्न हैं, जो कि पाँच खण्डों 'क', 'ख', 'ग', 'घ' तथा 'ङ' में विभक्त हैं। सभी प्रश्न अनिवार्य है।
खण्ड 'क' में प्रश्न संख्या 1 से 21 तक वस्तुनिष्ठ प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न 1 अंक का हैं। निर्देशानुसार इन प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
खण्ड 'ख' में प्रश्न संख्या 22 से 29 तक लघु उत्तरीय प्रश्न हैं। प्रत्येक प्रश्न 3 अंक का हैं। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 60-80 शब्दों से अधिक नहीं होना चाहिए।
खण्ड 'ग' में प्रश्न संख्या 30 से 32 तक दीर्घ उत्तरीय प्रश्न हैं, प्रत्येक प्रश्न 8 अंक का है। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 300-350 शब्दों से अधिक नहीं होना चाहिए।
खण्ड 'घ' में प्रश्न 33 से 35 तक चार उप प्रश्नों के साथ स्रोत आधारित प्रश्न है और प्रत्येक प्रश्न 4 अंकों का हैं।
खण्ड 'ङ' में प्रश्न संख्या 36 मानचित्र आधारित है, जिसमें 5 अंक हैं। मानचित्र को उत्तर-पुस्तिका के साथ संलग्न करें।

खण्ड क 


1. हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता थी-

(क) नगर योजना
(ख) व्यापार
(ग) कला
(घ) पशुपालन

उत्तर-

(क) नगर योजना।

2. प्रयाग प्रशस्ति में किस शासक की विजय का वर्णन किया गया है?

(क) खारवेल
(ख) सम्राट अशोक
(ग) समुद्रगुप्त
(घ) चंद्रगुप्त

उत्तर-

(ग) समुद्रगुप्त ।

3. महाभारत की रचना मूल रूप से किस भाषा में लिखी गई थी?

(अ) हिन्दी में
(ब) संस्कृत में
(स) पालि में
(द) प्राकृत में

उत्तर

(ब) संस्कृत में

4. 'त्रिपिटक' किस धर्म से सबध रखता है?

(क) हिंदू धर्म
(ख) जैन धर्म
(ग) इस्लाम धर्म
(घ) बौद्ध धर्म

उत्तर-

(घ) बौद्ध धर्म।

5. किताब-उल-हिंद की भाषा कौन सी है?

(अ) फारसी
(ब) अरबी
(स) उर्दू
(द) संस्कृत

उत्तर-

(ब) अरबी।

6. निज़ामुद्दीन औलिया' का संबंध किस सूफी सिलसिले से था?

(क) चिश्ती
(ख) सुहारावर्दी
(ग) कादरी
(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर-

(क) चिश्ती।

7. सर्वप्रथम विजयनगर की यात्रा पर आने वाला विदेशी यात्री कौन था?

(क) अब्दज्जाक
(ख) निकोली द कोन्टी
(ग) डोमिंगो पेस
(घ) नूनिज

उत्तर-

(ख) निकोली द कोन्टी

8. सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में भारत की कितने प्रतिशत आबादी शहरों में रहती थी?

(क) 8%
(ख) 10%
(ग) 15%
(घ) 20%

उत्तर- (ग) 15%

9. बम्बई दक्कन में कौन-सी राजस्व प्रणाली लागू की गई?

(क) रैयतवाड़ी
(ख) महलबाड़ी
(ग) स्थाई बंदोबस्त
(घ) इनमें से कोई नहीं

उत्तर-

(क) रैयतवाड़ी

10. सहायक संधि प्रणाली कितने तैयार की?

(क) लॉर्ड वेलेजली
(ख) लॉर्ड डलहौजी
(ग) कैनिंग
(घ) लार्ड मिण्टो

उत्तर-

(क) लॉर्ड वेलेजली

11. गाँधी-इर्विन समझौता कब हस्ताक्षरित हुआ?

(क) 1929
(ख) 1930
(ग) 1931
(घ) 1932

उत्तर- (ग) 1931.

12. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कौन-सा शब्द निहित नहीं है?

(क) समाजवाद
(ख) राजतंत्र
(ग) धर्मनिरपेक्ष
(घ) प्रजातांत्रिक

उत्तर-

(ख) राजतंत्र

निर्देशः निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में या वाक्य में दीजिए-

13. 1857 ई० का विद्रोह कब और कहाँ से शुरू हुआ था?

उत्तर- 10 मई, 1857 ई० को मेरठ छावनी से।

14. पुराणों की संख्या कितनी है?

उत्तर- 18

15. किस हड़प्पाई नगर की खोज सबसे पहले हुई थी?

उत्तर- हड़प्पा।

निर्देशः रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा कीजिए-

16. हड़प्पा सभ्यता की लिपि में चिन्हों की संख्या से के बीच हैं।

उत्तर-375-400

17. 'हर्षचरित' कन्नौज के शासक की जीवनी है।

उत्तर- हर्षवर्धन।

18. अशोक के अभिलेख लिपियों में लिखे गए थे।

उत्तर- ब्राह्मी और खरोष्ठी।


निर्देशः नीचे दो कथन दिए गए हैं, जिनमें एक को अभिकथन (A) और दूसरे को कारण (R) द्वारा अंकित किया गया है। इन दोनों कथनों को ध्यान से पढ़िए और नीचे दिए गए विकल्पों (a), (b), (c) एवं (d) में से उत्तर के रूप में सही विकल्प चुनिए।

19. अभिकथन (A): हड़प्पाई मुहर सम्भवतः हड़प्पा सभ्यता की सबसे विशिष्ट पुरावस्तु है।

कारण (R) : ये मोहरें सोने एवं चाँदी की बनी होती थी।

(a) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।

(b) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।

(c) अभिकथन (A) सही है परन्तु कारण (R) सही नहीं है।

(d) कारण (R) सही है परन्तु अभिकथन (A) सही नहीं है।


उत्तर-(c)


20. अधिकथन (A) कृषि क्षेत्रों को किलेबंद भू-भाग में समाहित किया जाता था।

कारण (R) : इसका मुख्य उद्देश्य प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था।

  • (a) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
  • (b) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
  • (c) अभिकथन (A) सही है परन्तु कारण (R) सही नहीं है।
  • (d) कारण (R) सही है परन्तु अभिकथन (A) सही नहीं है।

उत्तर-(a)

21. अभिकथन (A): 1929 में दिसम्बर के अन्त में कांग्रेस ने अपना वार्षिक अधिवेशन लाहौर शहर में किया।

            कारण (R) : भारत छोड़ो आंदोलन 1942 में शुरु हुआ।

  • (a) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या करता है।
  • (b) अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सही हैं परन्तु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं करता है।
  • (c) अभिकथन (A) सही है परन्तु कारण (R) सही नहीं है।
  • (d) कारण (R) सही है परन्तु अभिकथन (A) सही नहीं है।
उत्तर-(b)

खण्ड ख
22. संगम साहित्य पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर-
  • संगम साहित्य की रचना तमिल भाषा में की गई थी। संगम साहित्य के संरक्षण और सृजन में पांड्य शासकों का महान योगदान शामिल है। संगम साहित्य में ऐसी कविताएँ भी शामिल है जो सरदारों का विवरण देती है तथा इनसे यह भी पता चलता है कि सरदारों ने अपने स्त्रोतों का संकलन और वितरण किस प्रकार किया। सिलप्पादिकारम् संगम साहित्य का एक प्रमुख महाकाव्य है।

अथवा

गुप्तकाल में किए गए भूमि अनुदानों की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
गुप्तकाल में भूमिदान के जो प्रमाण मिले है, उनके अनुसार भूमि अनुदानों की निम्न विशेषताएँ थी-
  • (1) साधारण तौर ये भूमि अनुदान ब्राह्मणों या धार्मिक संस्थाओं को दिए गए थे।
  • (ii) महिलाओं को भूमि अनुदान देने का अधिकार नहीं था परन्तु चन्द्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावतीगुप्त ने भूमि अनुदान किया था। यह इतिहास में भूमि अनुदान का विरला उदाहरण है।
  • (iii) जो भूमि अनुदान के रूप में दी जाती थी, वह कर मुक्त भूमि होती थी।
23. स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्त्वपूर्ण रही होगी?
उत्तर- 
प्राचीन काल से ही, पितृवंशिकता वह व्यवस्था थी जिसमें वंश परंपरा पिता से पुत्र, फिर पौत्र आदि द्वारा चलती थी। महाभारत काल में भी इसके प्रमाण मिलते हैं। इसके महत्वपूर्ण होने के धार्मिक और सामाजिक कारण थे: 

  • वंश परंपरा को आगे बढ़ाना: 
    • तत्कालीन समाज में पुत्रों को ही वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता था।
  • स्त्री की स्थिति: 
    • समाज में स्त्री की स्थिति को निम्न माना जाता था और उन्हें सत्ता या संपत्ति का हकदार नहीं समझा जाता था। पुरुषों को ही इसके योग्य समझा जाता था।
  • उत्तराधिकार विवादों से बचाव: 
    • विशिष्ट परिवारों के माता-पिता नहीं चाहते थे कि उनके बाद संपत्ति या राजगद्दी के उत्तराधिकार को लेकर कोई झगड़ा हो, इसलिए पितृवंशिकता के आदर्श को अपनाया जाता था।
24. सूफ़ी शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर- 
  • इस्लाम धर्म में कुछ आध्यात्मिक लोगों का रहस्यवाद और वैराग्य की तरफ झुकाव बढ़ा, इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा। कुछ विद्वानों का मानना है कि सूफ़ी शब्द 'सूफ' शब्द से बना है जिसका अर्थ है 'ऊन' अर्थात् वे लोग जो खुरदरे ऊनी वस्त्र पहनते हो। अन्य विद्वान इस शब्द की उत्पत्ति 'सफा' से मानते हैं. जिसका अर्थ है साफ। इसके अर्थ और उत्पत्ति के विषय में विद्वान एकमत नहीं है।

25. अमरनायक कौन थे? उनके क्या कार्य थे?
                                                अथवा
विजयनगर प्रशासन में अमरनायकों की भूमिका का वर्णन कीजिए।
                                                 अथवा
विजयनगर साम्राज्य की अमरनायक व्यवस्था पर एक नोट लिखिए।
उत्तर - 
  1. उन्हें राय (विजयनगर के शासक) द्वारा प्रशासन के लिए राज्य क्षेत्र दिए जाते थे।
  2. वे किसानों, शिल्पकारों तथा व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूल करते थे।
  3. वे राजस्व का कुछ भाग व्यक्तिगत उपयोग तथा घोड़ों और हाथियों के रख-रखाव के लिए अपने पास रख लेते थे।
  4. मुसीबत के समय वे राजा को सैनिक सहायता भी प्रदान करते थे।
  5. वे वर्ष में एक बार राजा को उपहार देने के लिए राजदरबार में उपस्थित होते थे और राजा नियंत्रण रखने के लिए समय-समय पर उनका तबादला भी करते रहते थे।
26. मुगलकाल में ग्राम पंचायतों के कार्यों का उल्लेख करे।
उत्तर- 
मुगलकाल के ग्राम पंचायत का गठन गाँव के बुजुर्गों से होता था। पंचायत के मुखिया को मुकद्दम या मंडल कहा जाता था। संक्षेप में मुगलकालीन ग्राम पंचायत के मुख्य कार्य इस प्रकार थे।
  • (i) गाँव के विकास के लिए सामुदायिक कार्यों को संपन्न करना।
  • (ii) प्राकृतिक आपदाओं से निपटने का उचित प्रबंध करना।
  • (iii) पंचायत का एक बड़ा काम यह सुनिश्चित करना था कि गाँव में रहने वाले अलग-अलग जातियों के लोग अपनी जाति के नियमों का पालन करे।
  • (iv) पंचायतों को जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने जैसे गंभीर दंड देने का भी अधिकार होता था।
  • (v) पंचायत गाँव के दीवानी झगड़ों को भी सुलझाती थी।
27. महालवाड़ी भूमिकर प्रणाली विद्रोह के लिए क्यों उत्तरदायी थी?
उत्तर- 
  • 1857 ई० के विद्रोह की सबसे अधिक व्यापकता उत्तर भारत में देखी गई थी। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से अंग्रेजी सरकार ने महालवाड़ी भूमिकर प्रणाली को लागू किया था। यह प्रणाली काफी दोषपूर्ण थी। इसमें किसानों का अत्यधिक शोषण होता था तथा इनपर कठोर अत्याचार हुए। इस कारण किसान भी 1857 ई० के विद्रोह में शामिल हो गए थे।
28. लाहौर अधिवेशन (1929) का महत्त्व क्या है?
                                               अथवा
1929 का कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन किस प्रकार से महत्त्वपूर्ण था?
उत्तर- 
31 दिसम्बर 1929 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन प. जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में लाहौर में हुआ। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में इस अधिवेशन का बहुत अधिक महत्त्व है। इसके महत्व का वर्णन इस प्रकार है।-
  • (1) कांग्रेस ने 'पूर्ण स्वराज्य' को अपना मुख्य लक्ष्य घोषित किया।
  • (ii) प. जवाहर लाल नेहरू को अधिवेशन का अध्यक्ष बनाकर राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व नवयुवकों को सौंपा गया।
  • (iii) 26 जनवरी 1930 ई. का दिन पूरे देश में प्रथम स्वतन्त्रता दिवस के रूप में मनाने का निश्चय किया गया।
  • (iv) 31 दिसम्बर 1929 की आधी रात को रावी नदी के तट पर भारतीय स्वतन्त्रता का प्रतीक तिरंगा झंडा फहराया गया।
                                                                                            अथवा
    अहमदाबाद मिल हड़ताल पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
    उत्तर- 
    • 1918 ई. में अहमदाबाद की एक सूती कपड़ा मिल के मजदूरों ने बोनस को लेकर एक हड़ताल का आयोजन किया। 
    • महात्मा गाँधी जी द्वारा इस हड़ताल का नेतृत्व किया गया। 
    • गाँधी जी ने खुद भी इस हड़ताल में पहली बार अनशन रखा। 
    • मिल मालिक मजदूरों से समझौता करने के लिए तैयार हो गए तथा मजदूरों को 35 प्रतिशत भत्ता देने की घोषणा कर दी जिससे हड़ताल समाप्त हो गई. 
    • चम्पारण के बाद यह गांधी जी का भारत में दूसरा सफल सत्याग्रह था।
    29. संविधान सभा में हुई चर्चाएँ जनमत से कैसे प्रभावित हुई? व्याख्या कीजिए।
    उत्तर- 
    • संविधान सभा में विभिन्न मुद्दों पर हुई बहसों को विभिन्न पक्षों की दलीलों को तत्कालीन अखबारों में प्रकाशित किया जाता था जिस पर सार्वजनिक रूप में आम लोगों में बहस होती थी। सामूहिक सहभागिता का भाव उत्पन्न करने के लिए अखबारों के माध्यम से जनता के सुझाव भी आमंत्रित किए जाते थे। 
    इस प्रसंग में सभा को अनेक परस्पर विरोधी सुझाव मिले इनमें प्रमुख थे-
    • गौ हत्या पर पाबंदी, 
    • सवर्णों के दुर्व्यवहार पर रोक, 
    • विधायिका में जनसंहार के आधार पर सीटों का आरक्षण, 
    • संविधान का प्राचीन हिंदू कृतियों पर आधारित होना इत्यादि। 
    इस तरह प्रेस में होने वाली आलोचना एवं जवाबी आलोचना से किसी मुद्दे पर बनने वाली सहमति या असहमति पर गहरा असर पड़ता था जो यह सिद्ध करता है कि संविधान सभा में हुई चर्चाएँ जनमत से प्रभावित होती थी।

    खण्ड ग (स्रोत आधारित प्रश्न)
    30. बौद्ध ग्रंथ किस प्रकार तैयार किए जाते थे
    बुद्ध (अन्य शिक्षकों की तरह) चर्चा और बातचीत करते हुए मौखिक शिक्षा देते थे। महिलाएँ और पुरुष (शायद बच्चे भी) इन प्रवचनों को सुनते थे और इन पर चर्चा करते थे। बुद्ध के किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया। उनकी मृत्यु के बाद (पाँचवीं चौथी सदी ई.पू.) उनके शिष्यों ने 'ज्येष्ठों' या ज्यादा वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा वेसली (बिहार स्थित वैशाली का पालि भाषा में रूप) में बुलाई। वहाँ पर ही उनकी शिक्षाओं का संकलन किया गया। इन संग्रहों को 'त्रिपिटक' (शब्दार्थ भिन्न प्रकार के ग्रंथों को रखने के लिए 'तीन टोकरियाँ') कहा जाता था। पहले उन्हें मौखिक रूप से ही संप्रेषित किया जाता था। बाद में लिखकर विषय और लंबाई के अनुसार वर्गीकरण किया गया। विनय पिटक में संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह था। बुद्ध की शिक्षाएँ सुत्त पिटक में रखी गई और दर्शन से जुड़े विषय अभिधम्म पिटक में आए। हर पिटक के अंदर कई ग्रंथ होते थे। बाद के युगों में बौद्ध विद्वानों ने इन ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं। 

    प्रश्नः
    1. महात्मा बुद्ध अपनी शिक्षाएँ किस प्रकार देते थे?
    2. महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन कब और कैसे हुआ?
    3. त्रिपिटक से आप क्या समझते हो?

    उत्तर-
    1. महात्मा बुद्ध चर्चा और बातचीत के माध्यम से लोगों को मौखिक शिक्षा देते थे। लोग उनके प्रवचनों को सुनते थे और इन पर चर्चा करते थे।
    2. महात्मा बुद्ध की मृत्यु के बाद वैशाली में वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा का आयोजन किया गया। इस सभा में ही उनकी शिक्षाओं का संकलन किया गया।
    3. बुद्ध की शिक्षाओं के संकलन को त्रिपिटक कहा जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ 'तीन टोकरियाँ' हैं। इनका वर्णन इस प्रकार है:
    ( 1) विनयपिटक-इसमें संघ या मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह है।
    (2) सुत्तपिटक-इसमें बुद्ध की शिक्षाएँ संकलित है।
    (3) अभिधम्मपिटक-इसमें बौद्ध दर्शन से जुड़े विषय शामिल है।


    31. बाजार में संगीत
    यहाँ इब्नबतूता द्वारा दौलताबाद के विवरण से एक अंश दिया जा रहा है:
    दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों के लिए एक बाजार है जिसे ताराबवाद कहते हैं। यह सबसे विशाल और सुंदर बाजारों में से एक है। यहाँ बहुत सी दुकानें हैं और प्रत्येक दुकान में एक ऐसा दरवाजा है जो मालिक के आवास में खुलता है... दुकानों को कालीनों से सजाया गया है और दुकान के मध्य में झूला है जिस पर गायिका बैठती है। वह सभी प्रकार की भव्य वस्तुओं से सजी होती है और उसकी सेविकाएँ उसे झूला झुलाती हैं। बाजार के मध्य में एक विशाल गुंबद खड़ा है जिसमें कालीन बिछाए गए हैं और सजाया गया है इसमें प्रत्येक गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख, अपने सेवकों और दासों के साथ स्थान ग्रहण करते हैं। गायिकाएँ एक के बाद एक झुंडों में उनके समक्ष आकर सूर्यास्त का गीत गाती और नाचती हैं जिसके पश्चात वे चले जाते हैं। इस बाजार में इबादत के लिए मस्जिदें बनी हुई हैं... हिंदू शासकों में से एक.... जब भी बाजार से गुजरता था, गुंबद में उतर कर आता था और गायिकाएँ उसके समक्ष गान प्रस्तुत करती थी। यहाँ तक कि कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे। आपके विचार में इब्न बतूता ने अपने विवरण में इन गतिविधियों को रेखांकित क्यों किया?
    प्रश्नः
    1. इब्नबतूता कौन था?
    2. वर्तमान में दौलताबाद कहाँ स्थित है?
    3. दौलताबाद में ताराबबाद क्या था?
    4. दौलताबाद के बाजार का वर्णन कीजिए।

    उत्तर-
    1. इब्नबतूता मोरक्को का एक यात्री था।
    2. वर्तमान में दौलताबाद महाराष्ट्र में स्थित है।
    3. दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों के लिए एक बाजार था जिसे ताणबबाद कहा जाता था।
    4. दौलताबाद का बाजार सबसे विशाल और सुंदर बाजारों में से एक था। यहाँ बहुत सी दुकानें थीं। दुकानों को कालीनों से सजाया गया था। इस बाजार में इबादत के लिए एक मस्जिद भी थी।

    32. पाँचवीं रिपोर्ट से उद्धृत
    जमींदारों की हालत और ज़मीनों की नीलामी के बारे में पाँचवीं रिपोर्ट में कहा गया है :
    राजस्व समय पर नहीं वसूल किया जाता था और काफी हद तक ज़मीनें समय-समय पर नीलामी पर बेचने के लिए रखी जाती थीं। स्थानीय वर्ष 1203, तद्‌नुसार सन् 1796-97 में बिक्री के लिए विज्ञापित ज़मीन की निर्धारित राशि (जुम्मा) 28,70,061 सिक्का रु. थी और वह वास्तव में 17,90,416 रु. में बेची गई और 14,18,756 रु. की राशि जुम्मा के रूप में प्राप्त हुई। स्थानीय संवत 1204, तदनुसार सन् 1797-98 में 26,66,191 सिक्का रु. के लिए ज़मीन विज्ञापित की गई, 22,74,076 सिक्का रु० की ज़मीन बेची गई और क्रय राशि 21,47,580 सिक्का रु. थी। बाकीदारों में कुछ लोग देश के बहुत पुराने परिवारों में से थे। ये थे नदिया, राजशाही, विशनपुर (सभी बंगाल के जिले) आदि के राजा...। साल दर साल उनकी जागीरों के टूटते जाने से उनकी हालत बिगड़ गई। उन्हें गरीबी और बरबादी का सामना करना पड़ा और कुछ मामलों में तो सार्वजनिक निर्धारण की राशि को यथावत बनाए रखने के लिए राजस्व अधिकारियों को भी काफ़ी कठिनाइयाँ उठानी पड़ीं।

    प्रश्नः
    1. पाँचवीं रिपोर्ट क्या थी?
    2. जमींदार की जमींदारी की नीलामी का कारण क्या था?
    3. आंकड़ों के द्वारा पाँचवी रिपोर्ट में क्या दर्शाने की कोशिश की गई थी?

    उत्तर-
    1. पाँचवी रिपोर्ट भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों के विषय में तैयार की गई थी। इसे सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में पेश किया गया था।
    2. जो जमींदार निश्चित समय पर राजस्व जमा नहीं करा पाता था तो उसकी जमींदारी को नीलाम कर दिया जाता था।
    3. आंकड़ों के द्वारा इस रिपोर्ट में ईस्ट इंडिया कंपनी के कुप्रशासन को दर्शाने की कोशिश की गई थी।


    खण्ड - घ
    33. मोहनजोदड़ो की कुछ विशिष्टताओं का वर्णन कीजिए।
    अथवा
    "मोहनजोदड़ों एक सुनियोजित शहरी केन्द्र था।" उपयुक्त तर्कों सहित इस कथन की पुष्टि कीजिए।
    उत्तर-
    मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता अथवा सिंधु घाटी की सभ्यता का सबसे महत्वपूर्ण नगर था। इस नगर की कुछ विशेषताओं का वर्णन इस प्रकार है-
    • (i) एक नियोजित नगर-मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता का एक नियोजित नगर था। नगर को एक योजना के द्वारा बसाया गया था। इसमें जल निकासी की उत्तम व्यवस्था स्थापित की गई थी। सड़कें एक दूसरे को समकोण पर काटती थीं।
    • (ii) नगर का दो भागों में विभाजन-मोहनजोदड़ो नगर को दो भागों में विभाजित किया गया था। इसके ऊपरी भाग को दुर्ग तथा निचले भाग को निचला शहर कहा जाता था। सम्भवतः दुर्ग में कुलीन वर्ग तथा शासकों का निवास होता था तथा जन-सामान्य निचले शहर में रहते थे ।
    • (iii) गृह-स्थापत्य-मोहनजोदड़ों का निचला शहर आवासीय भवनों के उदाहरण प्रस्तुत करता है। लगभग हर घर में एक आँगन होता था जिसके चारों ओर कमरे बने होते थे। घर के निर्माण के समय एकांतता का विशेष ध्यान रखा जाता था। भूमि तल पर बनी दीवारों में खिड़‌कियाँ नहीं होती थी। हर घर में एक स्नानघर होता था जिसकी नालियाँ दीवार के माध्यम से सड़क की नालियों से जुड़ी हुईं थी। विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि मोहनजोदड़ो में 700 कुओं के होने के प्रमाण मिलते है जिनसे पानी की आवश्यकता की पूर्ति होती थी।
    • (iv) सड़कों तथा नालियों भी व्यवस्था इस नगर की अनूठी विशेषता इसकी नियोजित जल निकास प्रणाली थी। ऐसा प्रतीत होता है कि पहले नालियों के साथ गलियों को बनाया गया था और फिर आवासों का निर्माण किया गया था। यदि घरों के गन्दे पानी की गलियों की नालियों से जोड़ना था तो प्रत्येक घर की कम से कम एक दीवार का गली से सटा होना आवश्यक था।
    • (v) मालगोदाम व विशाल स्नानागार-मोहनजोदड़ो में दुर्ग में कुछ विशेष संरचनाएँ भी मिली है जिनका प्रयोग सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए किया जाता था। इनमें एक मालगोदाम एक ऐसी विशाल संरचना थी जिसके ईटों से बने केवल निचले हिस्से शेष है और एक विशाल स्नानागार सम्मिलित है। विशाल स्नानागार आँगन में बना एक आयताकार जलाशय है जो चारों ओर से एक गलियारे से घिरा है। जलाशय के तल तक जाने के लिए इसके उत्तरी और दक्षिणी भाग में दो सीढ़ियाँ बनी थी। सम्भवतः इसका प्रयोग किसी प्रकार के विशेष आनुष्ठानिक स्नान के लिए किया जाता था।
                                                            अथवा
    हड़प्पा सभ्यता में शिल्प उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की सूची बनाइए तथा चर्चा कीजिए कि ये किस प्रकार प्राप्त किए जाते होंगे?
    अथवा
    हड़प्पा सभ्यता में शिल्प उत्पावन के लिए प्रयुक्त कच्चे माल पर प्रकाश डालिए।
    उत्तर-
    हड़प्पा सभ्यता में कई प्रकार का शिल्प-उत्पादन होता था। इसके लिए विभिन्न प्रकार के कच्चे मालों की जरूरत पड़ती थी। इनमें से मुख्य कच्चे मालों की सूची नीचे दी गई है।
    • (1) कार्निलियन (सुंदर लाल रंग का)
    • (2) जैस्पर (एक प्रकार का उपरत्न)
    • (3) स्फटिक
    • (4) क्वार्टज
    • (5) शंख
    • (6) सेलखड़ी (एक प्रकार का पत्थर)
    • (7) ताँबा
    • (8) काँसा
    • (9) सोना
    • (10) मिट्टी
    • (11) लाजवर्द मणि
    • (12) अस्थियाँ
    • (13) विविध प्रकार की लकड़ियाँ तथा पत्थर
    • (14) फयॉन्स
    कच्चा माल प्राप्ति के तरीके मिट्टी, साधारण लकड़ी जैसे कुछ माल स्थानीय रूप से उपलब्ध थे परंतु पत्थर, बढ़िया लकड़ी तथा धातु जलोढ़क मैदान से बाहर के क्षेत्रों से मँगवाने पड़ते थे। इसके लिए हड़प्पावासी कई तरीके अपनाते थे, जो निम्नलिखित थं-
    • (i) बस्तियाँ स्थापित करना हड़प्पावासी उन स्थानों पर बस्तियाँ स्थापित करते थे, जहाँ कच्चा माल आसानी से उपलब्ध था। उदाहरण के लिए नागेश्वर और बालाकोट में शंख आसानी से उपलब्ध था। ऐसे ही कुछ अन्य पुरास्थल थे-सुदूर अफगानिस्तान में शोर्तुघई। यह स्थल अत्यंत कीमती माने जाने वाले नीले रंग के पत्थर लाजवर्द मणि के स्रोत के निकट स्थित था। इसी प्रकार लोथल कार्निलियन (गुजरात में भड़ौचं), सेलखड़ी (दक्षिणी राजस्थान 
    • (ii) अभियान भेजना अभियान भंजना कच्चा माल प्राप्त करने की एक अन्य नीति थी। उदाहरण के लिए राजस्थान के खेतड़ी अंचल में ताँबे तथा दक्षिण भारत में सोने के लिए अभियान भेजे गए। इन अभियानों के माध्यम से स्थानीय समुदायों के साथ संपर्क स्थापित किया जाता था। इन प्रदेशों में यदा-कदा मिलने वाली हड़प्पाई पुरावस्तुएँ इन संपर्कों की संकेतक हैं। खेतड़ी क्षेत्रों में मिले साक्ष्यों को पुरातत्वविदों ने गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति का नाम दिया है। यहाँ ताँबे की वस्तुओं की विशाल संपदा मिली थी। संभवतः इस क्षेत्र के निवासी हड़प्पा सभ्यता के लोगों को ताँबा भेजते थे।
    34. गुरु नानक देव जी के मुख्य उपदेशों अथवा शिक्षाओं का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ?
    उत्तर- 
    आरम्भिक जीवन गुरु नानक देव जी ने सिक्ख धर्म की स्थापना की थी। उनका जन्म 1469 ई० में पंजाब के तलवंडी नामक गाँव में हुआ था। यह स्थान अब पाकिस्तान में है तथा इसे अब ननकाना साहब के नाम से जाना जाता है। उन्होंने फारसी भाषा का अध्ययन करके लेखाकार प्रशिक्षण प्राप्त किया। छोटी आयु में ही उनका विवाह हो गया परन्तु वह अपना अधिक समय सूफी और भक्त संतों के बीच गुजारते थे। उन्होंने दूर-दूर की यात्राएँ भी की। गुरु नानक की प्रमुख शिक्षाएँ या उपदेश इस प्रकार है-

    • (1) सबका ईश्वर एक है-गुरु नानक देव जी ने एक ईश्वर में विश्वास की बात की। उन्होंने ईश्वर को निराकार, कालातीत, सर्वव्यापी तथा अदृश्य बताया। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मानव रूप में किसी के लिए ईश्वर का पूर्व ज्ञान होना असंभव है।
    • (ii) गुरु का महत्व-गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन में गुरु होने के महत्व पर काफी जोर दिया। उनके अनुसार गुरु ईश्वर की आवाज है और सभी ज्ञान प्राप्त करने का एकमात्र स्रोत है।
    • (iii) ईश्वर के प्रति पूर्ण संमर्पण गुरु नानक देव जी ने उपदेश दिया कि व्यक्ति को अपने आपको पूर्ण रूप से ईश्वर के प्रति समर्पित कर देना चाहिए। हमें ईश्वर के फैसलों को बिना सवाल उठाए स्वीकार करना चाहिए।
    • (iv) बाहरी आडम्बरों का विरोध-गुरु नानक देव जी ने धर्म के सभी बाहरी आडम्बरों का जोरदार तरीकों से विरोध किया। उन्होंने यज्ञ, तीर्थ-स्नान, मूर्तिपूजा, कठोर तप आदि कर्मकांडो को स्वीकार नहीं किया।
    • (v) स्मरण व नाम जपना उन्होंने ईश्वर (रब) की उपासना के लिए एक ही उपाय पर जोर दिया और वह था ईश्वर का लगातार स्मरण व नाम का जाप करना।
    • (vi) जाति प्रथा का विरोध-गुरु नानक देव जी सामाजिक समानता के पक्षधर थे। वे जाति प्रथा के बंधनों को स्वीकार नहीं करते थे। इसी कारण सभी जातियों के लोग उनके अनुयायी बने। उन्होंने संगत और पंगत की परंपरा के द्वारा जाति प्रथा पर जोरदार प्रहार किया।
    • (vii) तीन सिद्धान्त उन्होंने अपने अनुयायियों के सामने तीन सिद्वान्त रखे जो इस प्रकार है- 
      • (1) जरूरतमंद लोगों की मदद करना 
      • (2) पवित्र नाम का जप करना 
      • (3) ईमानदारी से कमाई करना। 
      • इसके अतिरिक्त गुरु नानक देव जी ने सत्य, सदाचार, परोपकार, सेवाभावना, नैतिकता आदि मानवीय गुणों को अपने जीवन में अपनाने पर जोर दिया।
    • विचारों का संप्रेषण-गुरु नानक देव जी ने अपने विचार पंजाबी भाषा में शब्द के माध्यम से सामने रखे। बाबा गुरु नानक ये शब्द अलग-अलग रागों में गाये थे और उनका सेवक मरदाना रबाब बजाकर उनका साथ देता था।
                                                                           अथवा 

    चिश्ती खानकाह की कार्य प्रणाली पर प्रकाश डालिए।
    उत्तर-
    खानकाह की कार्यप्रणाली निम्नलिखित बिंदुओं में समझी जा सकती है:

    • खानकाह का नियंत्रण शेख, पीर अथवा मुर्शीद के हाथों में होता था, जो अपने अनुयायियों की भर्ती और अपने वारिस की नियुक्ति करते थे. 
    • यहाँ आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित किए जाते थे और यह सामाजिक जीवन का केंद्र बिंदु था. 
    • शेख निजामुद्दीन औलिया की खानकाह दिल्ली में यमुना नदी के किनारे गियासपुर में थी, जहाँ सहवासी (शेख का परिवार, सेवक और अनुयायी) और अतिथि रहते थे. 
    • यहाँ उपासना (नमाज, ध्यान, और धार्मिक प्रवचन) की जाती थी, और आने वाले लोगों को भोजन और आश्रय प्रदान किया जाता था. 
      • सामुदायिक रसोईघर: इस खानकाह में एक सामुदायिक रसोईघर था जो दान के पैसों से चलता था।
      • विविध प्रकार के आगंतुक: सैनिक, व्यापारी, कवि और हिंदू योगी सहित सभी सामाजिक वर्गों के लोग विभिन्न कारणों से यहाँ आते थे।
      • स्थानीय परंपराओं का समावेश: शेख के सामने झुकना, जल अर्पित करना और योगिक व्यायाम जैसी प्रथाएं स्थानीय रीति-रिवाजों के एकीकरण को दर्शाती हैं।
      • प्रभाव का विस्तार: शेख निजामुद्दीन ने आध्यात्मिक उत्तराधिकारियों को नियुक्त किया जिन्होंने पूरे उपमहाद्वीप मेंखानकाहों की स्थापना की, जिससे चिश्ती विचारधारा की शिक्षाओं और प्रतिष्ठा का प्रसार हुआ।
    35. बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व संभालने के लिए पुराने शासकों र. क्या आग्रह किया?
    उत्तर- 
    • बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों (सैनिकों) ने नेतृत्व संभालने के लिए पुराने अपदस्थ शासकों से आग्रह किया कि वे विद्रोह को नेतृत्व प्रदान करें। क्योंकि वे जानते थे कि नेतृत्व व संगठन के बिना अंग्रेजों से लोहा नहीं लिया जा सकता। यह बात सही है कि सिपाही जानते थे कि सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व जरूरी है। इसीलिए सिपाही मेरठ में विद्रोह के तुरंत बाद दिल्ली पहुँचे। वहाँ उन्होंने बहादुरशाह को अपना नेता बनाया। वह वृद्ध था। बादशाह तो नाममात्र का ही था। स्वाभाविक तौर पर वह विद्रोह की खबर से बेचैन और भयभीत हुआ। यद्यपि अंग्रेजों की नीतियों से वह त्रस्त तो था ही फिर भी विद्रोह के लिए तैयार वह तभी हुआ जब कुछ सैनिक शाही शिष्टाचार की अवहेलना करते हुए दरबार तक आ चुके थे। सिपाहियों से घिरे बादशाह के पास उनकी बात मानने के लिए और कोई चारा नहीं था। अन्य स्थानों पर भी पहले सिपाहियों ने विद्रोह किया और फिर नवाबों और राजाओं को नेतृत्व करने के लिए विवश किया।
    अथवा
    अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? किसान ताल्लुकवार और जमींदार उसमें क्यों शामिल हुए?
    अथवा
    अवध में विवोह की व्यापकता के उत्तरदायी प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।
    उत्तर- 
    अवध में विद्रोह अपेक्षाकृत सबसे व्यापक था। इस प्रांत में आठ डिविजन थे उन सभी में विद्रोह हुआ। यहाँ किसान और दस्तकार से लेकर ताल्लुकदार और नवाबी परिवार के सदस्यों सहित सभी लोगों ने इसमें भाग लिया। हरेक गाँव से लोग विद्रोह में शामिल हुए। यहाँ विदेशी शासन के विरुद्ध यह विद्रोह लोक-प्रतिरोध का रूप धारण कर चुका था। लोग फिरंगी राज के आने से अत्यधिक आहत थे। उन्हें लग रहा था कि उनकी दुनिया लुट गई है, वो सब कुछ बिखर गया है, जिन्हें वो प्यार करते थे। संक्षेप में, विद्रोह की व्यापकता के निम्नलिखित कारण थे-

    • अवध का विलय: अवध को 1856 में 'कुशासन' का आरोप लगाकर ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया, जिसे स्थानीय लोगों ने अन्यायपूर्ण माना। नवाब वाजिद अली शाह की लोकप्रियता और उनके निष्कासन ने लोगों में सहानुभूति पैदा की. 
    • ताल्लुकदारों का अपमान: ब्रिटिश राज ने ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दीं और उनके दुर्ग ध्वस्त कर दिए, जिससे उनकी सत्ता, सम्मान और हैसियत को भारी क्षति पहुँची. 
    • भूमि छीनने की नीति: 1856 के 'एक मुश्त बंदोबस्त' (Summary settlement) ने ताल्लुकदारों से उनकी जमीनें छीन लीं, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई. 
    • किसानों का असंतोष: किसानों को भारी करों का बोझ उठाना पड़ता था और वे साहूकारों को ऋण चुकाने में विफल होकर अपनी पैतृक भूमि खो रहे थे. 
    • सांस्कृतिक और धार्मिक कारण: ब्रिटिश नीतियाँ स्थानीय परंपराओं और धार्मिक भावनाओं के खिलाफ थीं, जिससे लोगों में विरोध बढ़ा. 

    • किसानों में असंतोष 
      • ब्रिटिश नीति के कारण तालुकदारों के स्वामित्व वाली भूमि में काफी कमी आई, जो 67% से घटकर 38% हो गई।
      • ग्रामीण समाज की पारंपरिक व्यवस्था में व्यवधान के कारण किसानों ने अपने पूर्व जमींदारों के साथ मिलकर विद्रोह में भाग लिया।
      • तालुकदारों को परोपकारी व्यक्तियों के रूप में देखा जाता था जो त्योहारों और खराब फसल के दौरान ऋण और सहायता प्रदान करते थे।
      • नई ब्रिटिश भू-राजस्व प्रणाली में कठिनाई के समय लचीलेपन और सहानुभूति का अभाव था।
    संक्षेप में कहा जा सकता है कि अवध में विद्रोह विभिन्न सामाजिक समूहों का एक सामूहिक कृत्य था।


    खण्ड इ (मानचित्र कार्य)
    36. दिए गए भारत के राजनीतिक रेखा-मानचित्र पर निम्नलिखित स्थानों को दर्शाइए-
    • (i) सारनाथ
    • (ii) लोथल
    • (iii) पाटलीपुत्र
    • (iv) अजमेर
    • (v) झाँसी


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