Class 12 History
विचारक, विश्वास और इमारतें
Exercise Solution
प्रश्न 1. जैन धर्म के पाँच महाव्रत या अणुव्रत का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
- जैन धर्म के अनुयायियों के लिए पाँच महाव्रतों का पालन करना आवश्यक था।
- ये महाव्रत इस प्रकार है।-
- (i) हत्या न करना,
- (ii) चोरी न करना,
- (iii) झूठ न बोलना,
- (iv) धन संग्रह न करना,
- (v) ब्रह्मचर्य का पालन करना।
प्रश्न 2. छठी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान उत्पन्न हुए धार्मिक संप्रदायों को कितनी श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर-
छठी शताब्दी ईसा पूर्व के धार्मिक संप्रदाय को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है:
- 1. वे धर्म जो खुले तौर पर वैदिक धर्म के विरुद्ध थे,
- 2. जिन धर्मों ने खुले तौर पर वैदिक धर्म का विरोध नहीं किया, लेकिन पूजा के नए सिद्धांतों और नए या पुराने देवत्व का प्रचार किया ।
प्रश्न 3. वैष्णववाद की दो विशेषताएँ बताए।
उत्तर-
- (i) वैष्णववाद में विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है।
- (ii) इस परंपरा में विष्णु के दस अवतारों की कल्पना की गई है।
प्रश्न 4. 'बोधिसत' से आप क्या समझते है?
उत्तर -
- बोधिसत्व बौद्ध धर्म की एक प्रमुख अवधारणा है, विशेषकर महायान परंपरा में। यह शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है: 'बोधि' (ज्ञान) और 'सत्व' (प्राणी या मन)। महायान बौद्ध मत में बोधिसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने शुभ कार्यों के द्वारा पुण्य कमाते वे इन पुण्यों से दूसरों की सहायता करते थे।
प्रश्न 5. बौद्ध धर्म के चार सत्य कौन से है?
अथवा
बौद्ध धर्म के चार मूल सत्य क्या है?
उत्तर-
बौद्धधर्म के चार सत्य इस प्रकार है-
- (i) सम्पूर्ण संसार दुःखमय है।
- (ii) मनुष्य के दुःखों का कारण उसकी इच्छाएँ या अविद्या है।
- (iii) इच्छाओं को त्याग कर मनुष्य दुःखों से छुटकारा पर सकता है।
- (iv) अपनी इच्छाओं का त्याग मनुष्य मध्यम मार्ग अथवा अष्ट मार्ग पर चलकर कर सकता है।
प्रश्न 6. क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए ।
उत्तर
- उपनिषद मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के विचार में विश्वास करते हैं। मुख्य विचार कर्म के सिद्धांत का था। भाग्यवादी वे थे जो मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है। भौतिकवादियों का मानना था कि मनुष्य चार तत्वों से बना होता है। जब वह मरता है तब मिट्टी वाला अंश पृथ्वी में, जल वाला हिस्सा जल में, गर्मी वाला अंश आग में, साँस का अंश वायु में वापिस मिल जाता है और उसकी इंद्रियाँ अंतरिक्ष का हिस्सा बन जाती हैं मूल रूप से इनमें से सभी लगभग एक ही विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
प्रश्न 7. 'त्रिरत्न' से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर-
- त्रिरत्न एक संस्कृत शब्द है, जिसका शब्दिक अर्थ है- तीन रत्न। जैन धर्म में सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान ताः सम्यक चरित्र को त्रिरत्न कहा जाता है। जैन धर्म में निर्वाण त्रिरत्न की सहायता से प्राप्त किया जा सकता। इनके अर्थ का वर्णन इस प्रकार है-
- (i) सम्यक दर्शन यथार्थ ज्ञान के प्रति श्रद्धा रखना।
- (ii) सम्यक ज्ञान- सत्य तथा असत्य का ज्ञान ही सम्यक ज्ञान है।
- (ii) सम्यक चरित्र हितकारी कार्यों का आचरणा ही सम्यक चरित्र है।
प्रश्न 8. जैन धर्म का विभाजन किन दो सम्प्रदायों में हुआ था?
उत्तर-
जैन धर्म का विभाजन दिगम्बर और श्वेतांबर नामक सम्प्रदायों में हुआ था।
- (i) दिगम्बर: ये शरीर पर कपड़े धारण नहीं करते थे; दिशाएं ही उनका वस्त्र थीं।
- (ii) श्वेतांबर: ये सफेद रंग के कपड़े पहनते थे।
प्रश्न 9. गांधार शैली की मूर्तिकला की कोई तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर- गांधार शैली की मूर्तिकला की विशेषताएँ इस प्रकार है-
- गांधार शैली में बुद्ध के जीवन की घटनाएँ मुख्य विषय रहे हैं।
- इस शैली में महात्मा बुद्ध तथा बोधिसत्व की मूर्तियाँ बनाई गई थीं।
- इस शैली की मूर्तियों में यूनानी और भारतीय शैली का मिश्रित प्रभाव देखा जाता है, जिसे ग्रीको-बौद्ध कला भी कहते हैं।
- इनमें जातक कथाओं का भी चित्रण किया गया है।
प्रश्नः-10. "धर्म चक्रप्रवर्तन" से आप क्या समझते हैं?
उत्तरः-
- “धर्म चक्रप्रवर्तन" का अर्थ है, धर्म के चक्र को घुमाना। ज्ञान प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध ने वाराणसी के पास सारनाथ के मृगदाव में मृगदाव में आषाढ़ पूर्णिमा को अपना जो प्रथम धर्मोपदेश दिया, उसे "धर्म चक्रप्रवर्तन" के नाम से जाना जाता है।
प्रश्नः-11. वेदों के महत्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तरः-
- वैदिक साहित्य के सर्वाधिक महत्वपूर्ण ग्रंथ वेद है। वेद संख्या में चार हैं-ऋगवेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद। ऋगवेद वैदिक साहित्य में सबसे प्राचीन ग्रंथ है। यह ग्रंथ प्राचीन आर्यों के धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक जीवन पर प्रकाश डालता है।
प्रश्नः-12. स्तूप क्यों बनाए जाते थे?
उत्तरः-
- स्तूप महात्मा बुद्ध अथवा किसी अन्य पवित्र भिक्षु के अवशेषों, जैसे-दाँत, भस्म आदि अथवा किसी पवित्र ग्रन्थ पर बनाए जाते थे। अवशेष स्तूप के आधार के केन्द्र में बनाए गए एक छोटे से कक्ष में एक पेटिका में रख दिए जाते थे।
प्रश्नः-13. महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ-
- 1. विश्व अनित्य अर्थात् क्षणभंगुर है और यह निरन्तर परिवर्तित हो रहा है।
- 2. विश्व आत्माविहीन है क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी अथवा शाश्वत नहीं हैं।
- 3. विश्व में 'चार आर्य (श्रेष्ठ) सत्य' हैं। ये हैं-दुःख, दुःख समुदाय, दुःखनिरोध और दुःख निरोध मार्ग।
- 4. महात्मा बुद्ध कठोर तपस्या के विरूद्ध थे।
- 5. महात्मा बुद्ध ने दस शीलों के पालन पर बल दिया हैं।
प्रश्नः-10 बौद्ध धर्म के शीघ्रतम विकास के क्या कारण थे?
उत्तरः-
- 1. धर्म की भाषा सरल थी। जैसा कि भगवान बुद्ध हमेशा अपने उपदेश आम बोलचाल भाषा में दिया करते थे।
- 2. साधारण व शुद्ध धर्म, रीति-रिवाजों से परे था।
- 3. अनुकूल वातावरण क्योंकि हिन्दू धर्म में अवगुण की उत्पत्ति।
- 4. हिन्दू धर्म में बुराईया, कर्मकांड एवं बलि ।
- 5. पुरोहितों का वर्चस्व ।
- 6. हिन्दू धर्म में धन का अपव्यय।
- 7. जातिवाद एवं छूआछूत का न होना।
प्रश्न 10. बौद्ध धर्म के पतन के तीन कारण बताइए।
उत्तर-
- ( i) बौद्ध संघीय व्यवस्था में भ्रष्टाचार फैल गया था तथा बौद्ध भिक्षुओं का नैतिक पतन हो गया था। जिस कारण इस धर्म का पतन हो गया।
- (ii) बौद्ध धर्म हीनयान तथा महायान नामक दो सम्प्रदायों में बँट गया था। इस कारण भी इस धर्म का पतन हुआ।
- (iii) समय बीतने पर इस धर्म में भी अनेक कुरीतियाँ शामिल हो गई तथा यह धर्म भी एक जटिल धर्म बन गया जिस कारण इसका पतन हो गया।
- (iv) हिन्दु धर्म में अनेक विचारकों ने सुधार किया जिसके परिणामस्वरूप बौद्धधर्म पतन की तरफ अग्रसर हुआ।
प्रश्न 11. साँची स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका पर चर्चा कीजिए।
उत्तर-
साँची के स्तूप के अवशेषों के संरक्षण में भोपाल की बेगमों का निम्नलिखित योगदान रहा-
- (i) पहले फ्रांसीसियों ने और बाद में अंग्रेजों ने साँची के पूर्वी तोरणद्वार को अपने-अपने देश में ले जाने की कोशिश की। परंतु भोपाल की बेगमों ने उन्हें स्तूप की प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट कर दिया।
- (ii) शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन का अनुदान दिया।
- (iii) सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ एक संग्रहालय तथा अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया।
- (iv) जॉन मार्शल ने साँची पर लिखे अपने महत्त्वपूर्ण ग्रंथ सुल्तानजहाँ को समर्पित किए। इनके प्रकाशन पर बेगमों ने धन लगाया।
- (v) बेगमों द्वारा समय पर लिए गए विवेकपूर्ण निर्णय ने साँची के स्तूप को उजड़ने से बचा लिया। यदि ऐसा न होता तो इसकी दशा भी अमरावती के स्तूप जैसी होती।
स्तूप का निर्माण क्यों कराया गया?
यह विवरण महापरिनिब्बान से लिया गया है, जो सुत्त पिटक का हिस्सा है परिनिर्वाण से पूर्व आनंद ने पूछा "भगवान हम तथागत के अवशेषों का क्या करेंगे?" बुद्ध ने कहा "तथागत के अवशेषों को विशेष आदर देकर खुद को मत रोको. धर्म उत्साही बनो. अपनी भलाई के लिए प्रयास करो" लेकिन विशेष आग्रह करने पर बुद्ध बोले" उन्हें तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थुप बनाना चाहिए जो भी वहां धूप या माला चढ़ायेगा या वहां सिर नवायेगा या वहां पर हृदय में शांति लाएगा उन सबके लिए वह चिरकाल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा.
प्रश्न 1 स्तूप क्या हैं?
प्रश्न 2. यह अंश बौद्ध ग्रन्थ के किस अध्याय से लिया गया है?
प्रश्न 3. तथागत कौन थे? उन्होंने स्तूप के महत्व के बारे में क्या बताया था?
उत्तर 1 : स्तूप पवित्र स्थान थे। उन्होंने बुद्ध के शरीर के अवशेषों को संरक्षित किया इन सभी चीजों को स्तूपों में दफनाया गया था।
उत्तरः2 यह अंश "महापरिनिर्वाण सुत्त" से लिया गया है।
उत्तरः3 तथागत बुद्ध का दूसरा नाम था। उन्होंने अच्छे कर्मों के महत्व पर जोर दिया। पवित्र स्थानों पर स्तूपों को स्थापित किया जाए। जो भी वहां धूप या माला चढ़ायेगा या वहां सिर नवायेगा या वहां पर हृदय में शांति लाएगा उन सबके लिए वह चिरकाल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा.
यज्ञों की परंपरा
चिंतन, धार्मिक विश्वास और व्यवहार की कई धाराएँ प्राचीन युग से ही चली आ रही थीं। पूर्व वैदिक परंपरा जिसकी जानकारी हमें 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित ऋग्वेद से मिलती है, वैसी ही एक प्राचीन परंपरा थी। ऋग्वेद अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुति का संग्रह है। यज्ञों के समय इन स्त्रोतों का उच्च्चारण किया जाता था और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे। शुरू-शुरू में यज्ञ सामूहिक रूप से किए जाते थे। बाद में (लगभग 1000 ईसा पूर्व 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिकों द्वारा किए जाते थे। राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा किया करते थे। इनके अनुष्ठान के लिए उन्हें ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था।
प्रश्नः
1. ऋग्वेद के बारे में आप क्या जानते हो?
2. ऋग्वेद में किन-किन देवताओं की स्तुति की गई है?
3. लोग किन उद्देश्यों की पूर्ति हेतू यज्ञ करवाते थे?
4. दो जटिल यज्ञों के नाम बताइए।
5. जटिल यज्ञों के अनुष्ठान के लिए किन पर निर्भर रहना पड़ना था?
उत्तर-
1. चारों वेदों में ऋग्वेद सबसे प्राचीन वेद है। इसमें अनेक देवताओं की स्तुति की गई है।
2. अग्नि, इंद्र, सोम आदि की।
3. लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि प्राप्त करने हेतू यज्ञ करवाते थे।
4. राजसूय और अश्वमेध।
5. ब्राह्मण पुरोहितों पर।
महायान बौद्ध मत का विकास
ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं। प्रारंभिक बौद्ध मत में निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्त्व दिया गया था। बुद्ध को भी एक मनुष्य समझा जाता था जिन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से प्रबोधन और निब्बान प्राप्त किया। परंतु धीरे-धीरे एक मुक्तिदाता की कल्पना उभरने लगी। यह विश्वास किया जाने लगा कि वे मुक्ति दिलवा सकते थे। साथ-साथ बोधिसत्त की अवधारणा भी उभरने लगी। बोधिसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे। लेकिन वे इस पुण्य का प्रयोग दुनिया को दुखों में छोड़ देने के लिए और निब्बान प्राप्ति के लिए नहीं करते थे। बल्कि वे इससे दूसरों की सहायता करते थे। बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई।
चिंतन की इस नयी परंपरा को महायान के नाम से जाना गया। जिन लोगों ने इन विश्वासों को अपनाया उन्होंने पुरानी परंपरा को हीनयान नाम से संबोधित किया।
प्रश्नः
1. प्रारंभिक बौद्ध मत की विशेषता बताइए।
2. धीरे-धीरे बौद्ध मत में क्या बदलाव आया?
3. बोधिसत कौन थे?
4. बौद्ध धर्म किन दो सम्प्रदायों में विभाजित हो गया था?
5. महायान बौद्ध मत की एक विशेषता बताइए।
उत्तर-
1. प्रारंभिक बौद्ध मत ने निर्वाण प्राप्त करने के लिए व्यक्तिगत प्रयास को महत्त्व दिया तथा महात्मा बुद्ध को भी एक मनुष्य समझा जाता था?
2.धीरे-धीरे बौद्ध मत में मुक्तिदाता की कल्पना की जाने लगी।
3.बोधिसतों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने अच्छे कार्यों से पुण्य कमाते थे।
4.हीनयान और महायान।
5. महायान बौद्ध मत में महात्मा बुद्ध और बोधिसतों की मूर्तिपूजा होने लगी।

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