Chapter 6 –महात्मा गांधी व भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष Exercise Solution
प्रश्न 1. असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम एवं महत्व पर चर्चा करें।
उत्तर – आंदोलन के कार्यक्रम :-
- सरकारी शिक्षण संस्थाओं का बहिष्कार।
- सरकारी उपाधियों तथा अवैतनिक पदों को त्यागना।
- सरकारी दरबारों तथा उत्सवों में सम्मिलित न होना।
- सरकारी अदालतों का बहिष्कार करना।
- पंचायतों की स्थापना करना।
- विदेशी माल का बहिष्कार करना और उसके स्थान पर स्वदेशी माल का प्रयोग करना।
- 1919 ई. के एक्ट के अनुसार होने वाले चुनावों में भाग न लेना।
- सैनिकों, क्लर्कों और श्रमिकों द्वारा विदेश में नौकरी न करना ।
- हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल देना व अहिंसा के मार्ग पर चलना ।
असहयोग आंदोलन का महत्व – इस आंदोलन में हिंदुओं, मुसलमानों, शिक्षित व अशिक्षित लोगों, अध्यापकों व छात्रों, पुरुषों और स्त्रियों ने भाग लिया। पहली बार राष्ट्रीय आंदोलन ने देशव्यापी आंदोलन का रूप धारण किया। अब लोगों के मन में से सरकार के विरुद्ध आवाज उठाने व जेल जाने का भय समाप्त हो गया। लोगों में सरकार से सीधी टक्कर लेने का जोश उत्पन्न हो गया। साथ ही साथ देश के अंदर कई नए रचनात्मक कार्य भी हुए जैसे-राष्ट्रीय शिक्षण संस्थाओं की स्थापना व लोगों को रोजगार प्रदान करना। लोग देश के लिए बड़े से बड़ा बलिदान देने के लिए तैयार हो गए।
प्रश्न 2. गांधी जी के आंदोलनों में स्वदेशी के महत्व पर विचार करें।
उत्तर – गांधी जी 1915 ई. में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। गांधी जी ने सत्याग्रह को बुराइयों का सामना करने के लिए रामबाण बताया। गांधी जी स्वदेशी के महत्व को समझते थे इसलिए उन्होंने स्वयं इसकी पालना करते हुए अपने अनुयायियों को खादी के वस्त्र पहनने के लिए प्रेरित किया। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा, असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी लोगों से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी अपनाने को कहा। इन सब आंदोलनों के चलते भारतीय व्यापारी की दशा में सुधार आया।
प्रश्न 3. निम्नलिखित पर विचार करें:
(क) रौलट सत्याग्रह
(ख) खिलाफत एवं सांप्रदायिकता
(ग) दांडी यात्रा
(घ) नमक सत्याग्रह
(ड.) पूना समझौता
(च) करो या मरो
(छ) गांधी- जिन्ना वार्ता
(ज) लोक सेवा संघ
(क) रौलट सत्याग्रह
फरवरी 1919 ई. में केंद्रीय विधान सभा में दो बिल पेश किए गए। इन बिलों के द्वारा नौकरशाही को क्रांतिकारी गतिविधियां दबाने के लिए असीम शक्तियाँ दी गई थीं। महात्मा गांधी ने वायसराय से इन बिलों को पास न करने की प्रार्थना की परंतु विरोध के बावजूद इनमें से एक बिल को पास कर दिया गया जिसे ‘ रौलट एक्ट’ का नाम दिया गया। महात्मा गांधी ने 30 मार्च, 1919 ई. को रौलट एक्ट के विरोध में और देशव्यापी हड़ताल करने की अपील की। बाद में यह तिथि बदलकर 6 अप्रैल कर दी गई परंतु दिल्ली जैसे शहरों में दोनों दिन हड़ताल हुई। गांधी जी ने उन इलाकों में जाना चाहा परंतु इससे पहले ही पलवल के स्टेशन पर उन्हें बंदी बना लिया गया। महात्मा गांधी को बंदी बनाए जाने की सूचना भारतवर्ष में आग की तरह फैल गई। कई नगरों में पुलिस और जनता के बीच झगड़े हुए। लोगों ने हड़तालों व प्रदर्शनों का सहारा लेकर अपने नेताओं की रिहाई की मांग की परंतु सरकार ने लोगों को तितर-बितर करने के लिए उन पर गोलियां चला दी। जिसके परिणामस्वरूप कई लोग मारे गए और घायल हुए।
(ख) खिलाफत एवं सांप्रदायिकता
भारत के कुछ मुसलमान तुर्की के सुल्तान को अपना धार्मिक नेता मानते थे । इस नाते उनकी खलीफा के साथ पूर्ण सहानुभूति थी। प्रथम विश्वयुद्ध में पराजित तुर्की के खलीफा के साथ न्यायोचित व्यवहार सुनिश्चित करने हेतु ब्रिटिश सरकार पर पर्याप्त दबाव बनाने के लिए इन मुसलमानों ने जिस आंदोलन का सूत्रपात किया वह ‘खिलाफत आंदोलन’ कहलाता है। उन्होंने हिंदुओं को भी आदेश दिया कि वह तन, मन, धन से भारत के मुसलमानों का इस आंदोलन में साथ दें। 31 अगस्त, 1920 ई. को खिलाफत कमेटी के निर्णय के अनुसार असहयोग आंदोलन आरंभ कर दिया गया। जिस समय भारत के मुसलमान तुर्की के खलीफा की खिलाफत की सुरक्षा के लिए आंदोलनरत थे, उसी दौरान तुर्की के कमालपाशा जैसे आधुनिक मुस्लिम खिलाफत के अंत की योजना बना रहे थे। साम्राज्यवादी शासन एवं खिलाफत प्रथा का अंत कर वहाँ नई सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था कायम की गई। उनके विशेष प्रयासों से ही तुर्क जाति आधुनिक जाति बनी। कमाल पाशा ने तुर्की को ‘पंथ निरपेक्ष राष्ट्र’ घोषित करके आधुनिक रूप से शिक्षित किया तथा पुराने रीति रिवाजों को ही नहीं, बहुविवाह एवं बुर्के आदि को भी समाप्त किया।
(ग) दांडी यात्रा
सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रारंभ 12 मार्च, 1930 ई. को महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा से किया। आरंभ में गांधी जी के साथ 78 अनुयायियों ने भाग लिया परंतु धीरे-धीरे मार्ग में सैकड़ों लोगों ने उन्हें अपना समर्थन दिया। 24 दिन के पश्चात् 6 अप्रैल, 1930 ई. को महात्मा गांधी दांडी के समुद्र तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने समुद्र के पानी से नमक तैयार करके नमक कानून का उल्लंघन किया।
(घ) नमक सत्याग्रह
सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रारंभ 12 मार्च, 1930 ई. को महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा से किया। आरंभ में गांधी जी के साथ 78 अनुयायियों ने भाग लिया परंतु धीरे-धीरे मार्ग में सैकड़ों लोगों ने उन्हें अपना समर्थन दिया। 24 दिन के पश्चात् 6 अप्रैल, 1930 ई. को महात्मा गांधी दांडी के समुद्र तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने समुद्र के पानी से नमक तैयार करके नमक कानून का उल्लंघन किया। उनका यह कार्य इस बात का प्रतीक था कि सारे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया जाए। सविनय अवज्ञा आंदोलन शीघ्र ही सारे देश में फैल गया। प्रत्येक संभव स्थान पर नमक बनाया गया अथवा अन्य कानूनों का उल्लंघन किया गया। सरोजिनी नायडू ने धरासना में तथा चक्रवर्ती राजागोपालाचार्य ने वेदारण्यम में ‘नमक सत्याग्रह’ किया।
(ड.) पूना समझौता
दूसरे गोलमेज सम्मेलन में मुसलमान, सिक्ख और भारतीय ईसाइयों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गयी। अछूतों को हिन्दुओं से अलग मानकर पृथक निर्वाचन और प्रतिनिधित्व का अधिकार दिया गया। प्रान्तीय व्यवस्थापिकाओं में स्त्रियों को तीन प्रतिशत स्थान सुरक्षित कर दिये गये। गांधी जी ने इसका विरोध किया क्योंकि यह भारतीय एकता के लिए हानिकारक था। गांधी जी ने इस घोषणा के विरोध में आमरण अनशन आरम्भ कर दिया जिससे सारे देश में हलचल मच गई। कुछ नेताओं के प्रयासों से गांधी जी व डॉ. अम्बेडकर के बीच समझौता हो गया जिसे “पूना समझौता’ कहा जाता है।
(च) करो या मरो
भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव के पास होने के अगले दिन ही कांग्रेस के मुख्य नेताओं को बंदी बना लिया गया। गांधी जी ने ‘करो या मरो’ का नारा देते हुए कहा ‘एक छोटा सा मंत्र है जो मैं आपको देता हूं, उसे आप अपने हृदय में अंकित कर सकते हैं और अपनी हर सांस द्वारा व्यक्त कर सकते हैं वह मंत्र है ‘करो या मरो’, या तो हम भारत को आजाद कराएंगे या इस कोशिश में अपनी जान दे देंगे।’ जयप्रकाश नारायण, अरुणा आसफ अली एवं राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर इस आंदोलन का संचालन किया। इस राष्ट्रव्यापी आंदोलन में वकीलों, अध्यापकों, व्यापारियों, डॉक्टरों, पत्रकारों, मजदूरों, विद्यार्थियों व स्त्रियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। विभिन्न नगरों में सभाएँ की गई एवं जुलूस निकाले गए। लोगों ने हिंसा का उत्तर हिंसा से दिया। कई सरकारी भवनों व पुलिस थानों को जला दिया गया, तार की लाइनें काट दी गई।
(छ) गांधी- जिन्ना वार्ता
भारत छोड़ो आंदोलन के बाद मई 1944 ई. में गांधी जी को जेल से रिहा कर दिया गया। तत्पश्चात् गांधी जी ने विभाजन को टालने तथा मोहम्मद अली जिन्ना को मनाने के लिए 9 सितंबर से 27 सितंबर, 1944 ई. के बीच कई दौर की बातचीत की। इस गांधी- जिन्ना वार्ता में गांधी जी जिन्ना के लिए ‘कायदे आज़म’ का सम्बोधन करते रहे, जिससे जिन्ना और अधिक अहंकारी हो गये। जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग को मनवाने के लिए 16 अगस्त, 1946 ई. को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ घोषित किया। जिससे बंगाल, बिहार और बंबई में दंगे हुए, जिसमें 5 हजार लोग मारे गए तथा 15 हजार लोग घायल हुए।
(ज) लोक सेवा संघ
स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस में व्याप्त भ्रष्टाचार से आहत होकर गांधी जी ने ऑल इंडिया स्पीनर एसोसिएशन, हरिजन सेवक संघ, ग्राम उद्योग संघ, गौ सेवा संघ एवं नई तालीमी संघ जैसे संगठनों के मुख्य प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया तथा सम्मेलन के बाद कांग्रेस का उद्देश्य पूरा हो जाने के कारण कांग्रेस को समाप्त करने तथा उसके स्थान पर लोक सेवा संघ बनाने की योजना बनाई, लेकिन ऐसा करने से पूर्व ही उनकी हत्या हो गई।
प्रश्न 4. भारत छोड़ो आंदोलन की उत्पत्ति एवं प्रसार की व्याख्या करें।
उत्तर – भारत छोड़ो आंदोलन के शुरू किए जाने का मुख्य कारण क्रिप्स मिशन की असफलता व जापान की बढ़ती हुई शक्ति थी। क्रिप्स मिशन के सुझावों में ब्रिटिश सरकार की भारतीयों को स्वराज देने की नीति स्पष्ट नहीं थी। जापान की बढ़ती हुई शक्ति से ब्रिटिश सरकार चिंतित थी क्योंकि भारतीयों के सहयोग के बिना वह इसका मुकाबला नहीं कर सकती थी। वहीं दूसरी ओर भारतीयों की यह सोच थी कि वे स्वयं जापान का मुकाबला करें इसलिए वे जापान के आक्रमण से पहले ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाना चाहते थे। उन्होंने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रस्ताव पास किया। गांधी जी ने जनता से निष्क्रियता की भावना को दूर करने के लिए ‘ अंग्रेजो भारत छोड़ो’ का नारा दिया, ब्रिटिश सरकार के व्यवहार से तंग आकर कांग्रेस ने 8 अगस्त, 1942 ई. को बंबई अधिवेशन में भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पास किया। इसके अनुसार यह मांग की गई कि अंग्रेजों को तुरंत बिना शर्त भारत छोड़ देना चाहिए। भारत छोड़ो आंदोलन के प्रस्ताव के पास होने के अगले दिन ही कांग्रेस के मुख्य नेताओं जैसे गांधी जी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, अबुल कलाम आजाद, राजेंद्र प्रसाद, पट्टाभि सीतारमैया आदि नेताओं को बंदी बना लिया गया। इस खबर से भारतीयों में रोष की भावना प्रबल हो गई। मुंबई, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम, उत्तर-पश्चिमी सीमा प्रांतों के लोग ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए तैयार हो गए। अंग्रेजी सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए दमन की नीति का सहारा लिया। सरकार ने शांतिपूर्ण जुलूसों पर गोलियाँ चलाई व लाठीचार्ज किया। एक लाख से अधिक स्त्री-पुरुषों को बंदी बना लिया गया। प्रदर्शनकारियों पर भारी जुर्माने किए गए, देश में चारों ओर अराजकता और अशांति फैल गई।
प्रश्न 5. गांधी जी ने पटेल की बजाए नेहरू को क्यों चुना? क्या आप उनके निर्णय को उचित मानते हैं?
उत्तर – बहुत सारे प्रांतों की अधिकतर कांग्रेस कार्य समितियों ने सरदार पटेल का नाम कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए सुझाव दिया था। गांधी जी का विचार था कि नेहरू अंग्रेजों से आजादी के समय बेहतर लेनदेन कर सकता है तथा देश के बाहर भी उसे लोग जानते हैं। वह दूसरा स्थान कभी स्वीकार नहीं करेंगे। इसी कारण गांधीजी ने पटेल की बजाय नेहरू को चुना। गांधी जी ने नेहरू का चयन करके भी सही किया क्योंकि उस समय के हालात को देखते हुए अच्छे लेन-देन और विदेशी रणनीति को बेहतर समझने के लिए और कोई नहीं था। इसके अतिरिक्त माउंटबेटन की नेहरू के साथ गहरी दोस्ती थी जो उस समय भारत के वायसराय बने थे।
प्रश्न 6. गांधी जी कांग्रेस को क्यों समाप्त करना चाहते थे?
उत्तर – स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस में व्याप्त भ्रष्टाचार से आहत होकर गांधी जी ने ऑल इंडिया स्पीनर एसोसिएशन, हरिजन सेवक संघ, ग्राम उद्योग संघ, गौ सेवा संघ एवं नई तालीमी संघ जैसे संगठनों के मुख्य प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन बुलाया तथा सम्मेलन के बाद कांग्रेस का उद्देश्य पूरा हो जाने के कारण कांग्रेस को समाप्त करने तथा उसके स्थान पर लोक सेवा संघ बनाने की योजना बनाई
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