HBSE Class 9 सामाजिक विज्ञान Chapter 3 –उदारवादी एवं राष्ट्रवादी ( 1857 ई. से 1919 ई. तक Exercise Solution

 Chapter 3 –उदारवादी एवं राष्ट्रवादी ( 1857 ई. से 1919 ई. तक Exercise Solution


कुछ महत्वपूर्ण तिथियां –
  • तिलक द्वारा गणपति उत्सव का आरंभ – 1893 ई.
  • तिलक द्वारा शिवाजी उत्सव का आरंभ – 1895 ई.
  • बंगाल का विभाजन – 1905 ई.
  • कांग्रेस में विभाजन – 1907 ई.
  • मार्ले मिण्टो अधिनियम – 1909 ई.
  • बंगाल विभाजन रद्द हुआ – 1911 ई.
  • कांग्रेस मुस्लिम लीग में लखनऊ समझौता – 1917 ई.
  • लाला लाजपत राय की मृत्यु – 1928 ई.


रिक्त स्थान भरें

1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक __________ थे।

2. बंगाल का विभाजन गवर्नर जनरल ___________के शासन काल में हुआ।

3. ‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ – ये शब्द __________ ने कहे।

4. ‘शेर-ए-पंजाब’ _________ को कहा जाता है।

उत्तर – 1. ए. ओ. ह्यूम, 2. लॉर्ड कर्जन, 3. बाल गंगाधर तिलक, 4. लाला लाजपत राय

उचित मिलान करें

होमरूल आंदोलन       न्यू इंडिया
बाल गंगाधर तिलक   उदारवादी नेता
लाला लाजपत राय    एनी बेसेंट
विपिन चंद्र पाल        केसरी
गोपाल कृष्ण गोखले  पंजाबी


उत्तर –
होमरूल आंदोलन       एनी बेसेंट 
बाल गंगाधर तिलक   केसरी 
लाला लाजपत राय    पंजाबी
विपिन चंद्र पाल        न्यू इंडिया
गोपाल कृष्ण गोखले  उदारवादी नेता


फिर से जाने :-
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना 1885 ई. में हुई और इसके संस्थापक ए. ओ. ह्यूम थे।
उदारवादियों के चार प्रमुख नेता महादेव गोविंद रानाडे, दादाभाई नौरोजी, गोपाल कृष्ण गोखले व सुरेन्द्रनाथ बनर्जी थे।
बंगाल विभाजन लॉर्ड कर्जन ने 1905 ई. में किया।
राष्ट्रवादियों के तीन प्रमुख नेता लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक, विपिन चन्द्र पाल थे।
लखनऊ समझौता 1916 ई. में कांग्रेस व मुस्लिम लीग के बीच हुआ।

आइये विचार करें

प्रश्न 1. उदारवादी कौन थे? उनकी मुख्य माँगे क्या थीं?

उत्तर – उदारवादी वे लोग थे जो ब्रिटिश शासन के समर्थक थे। उनका लक्ष्य ब्रिटिश शासन के अधीन ही स्वशासन की प्राप्ति करना था । उदारवादी चाहते थे कि विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए, उनके अधिकारों में वृद्धि की जाए तथा परिषदों के सदस्यों को लोगों द्वारा चुना जाए। उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों को भी नियुक्त किया जाए।

उदारवादियों की मुख्य माँगें निम्नलिखित थी :-
  • विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि की जाए।
  • प्रशासनिक सेवा में भारतीयों की नियुक्ति की जाए।
  • सेना के खर्चे में कमी की जाए।
  • सामान्य तथा तकनीकी शिक्षा का विस्तार किया जाए।
  • उच्च पदों पर भारतीयों की अधिक नियुक्ति की जाए।
  • न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग किया जाए।
  • किसानों पर करों का बोझ कम किया जाए।
  • नागरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो।
  • नमक पर कर में कमी की जाए।
  • प्रेस पर लगाए गए प्रतिबंध हटाए जाएं।

प्रश्न 2. उदारवादियों एवं राष्ट्रवादियों में मुख्य अंतर क्या थे?

उत्तर –
उदारवादी 
  1. इनका लक्ष्य ब्रिटिश शासन के अधीन ही स्वशासन की प्राप्ति करना था।
  2. उदारवादी चाहते थे कि विधान परिषदों में इनके सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।
  3. उदारवादी लोग सरकार के सामने पूरी नरमी और उदारता से अपनी मांगे रखते थे।
  4. उदारवादी नेता शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक साधनों के पक्ष में थे। 
राष्ट्रवादी
  1. इनका लक्ष्य ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़ फेंकना था।
  2. राष्ट्रवादी विधान परिषद में अपना ही अधिकार चाहते थे।
  3. राष्ट्रवादी लोग सरकार का विरोध करते थे और अपनी मांगे जबरदस्ती मनवाते थे।
  4. राष्ट्रवादी नेता बिना किसी कानून की प्रवाह के देश की आजादी चाहते थे।


प्रश्न 3. बंगाल को विभाजित करने के पीछे अंग्रेजों का क्या उद्देश्य था?

उत्तर – ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन का यह कारण बताया कि बंगाल बहुत बड़ा प्रांत है और उसका प्रशासन सुचारू रूप से चलाना बहुत कठिन है परंतु वास्तव में अंग्रेज़ सरकार भारत में राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रवादी आंदोलन को कमजोर करना चाहती थी। इस विभाजन का उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम एकता को नष्ट करना था।

प्रश्न 4. बंग-भंग विरोधी आंदोलन क्या था?

उत्तर – बंगाल के राष्ट्रवादियों ने बंगाल विभाजन का घोर विरोध किया। राष्ट्रवादियों द्वारा बंगाल विभाजन को पूर्व नियोजित घृणित कार्य कहा गया। बंगाल विभाजन के परिणामस्वरूप ‘बंग-भंग विरोधी आंदोलन’ आरंभ हुआ। 16 अक्टूबर, 1905 ई. को बंगाल विभाजन लागू किया जाना था। इस दिन को ‘शोक दिवस’ घोषित किया गया, समस्त बंगाल में हड़ताल रखी गई, जुलूस निकाले गए और विरोध में सभाएँ आयोजित की गई। सारा बंगाल ‘वंदे मातरम्’ के नारों से गूंज उठा। नेताओं की अपील पर लोगों ने ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार कर दिया और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करने का प्रण लिया। यह आंदोलन केवल बंगाल तक ही सीमित न रह कर अन्य भागों में भी फैल गया। अंततः सरकार को इन राष्ट्रवादियों द्वारा उठाए गए तूफान के आगे झुकना पड़ा और 1911 ई. में बंगाल विभाजन रद्द करना पड़ा।

प्रश्न 5. स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के महत्व पर विचार करें।

उत्तर – स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का भारतीय इतिहास में बहुत महत्व है जिसका वर्णन निम्नलिखित है:-
  • इस आंदोलन से भारतवासियों में राष्ट्रीयता और देशप्रेम की भावना बढ़ने लगी।
  • इस आंदोलन से लोगों में स्वदेशी वस्तुओं का प्रचलन अत्यधिक बढ़ गया।
  • इससे भारतीय उद्योगों का अपार विकास हुआ। इस आंदोलन के फलस्वरूप देश के विभिन्न भागों में कपड़ा मिलें, साबुन और दियासलाई के कारखाने लग गए।
  • स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन ने साहित्य पर विशेष प्रभाव डाला। उस समय राष्ट्रीय विचारों से ओत-प्रोत कई कविताओं, गद्य, गीत आदि की रचना हुई।
  • इस आंदोलन में पहली बार भारतीय महिलाओं ने भी भाग लिया। कई स्थानों पर जुलूसों और धरनों में उन्होंने भाग लिया।
  • स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन ने बंग-भंग के विरुद्ध लोगों को संगठित कर दिया और विवश होकर ब्रिटिश सरकार को 1911 ई. में बंगाल विभाजन रद्द करना पड़ा।

प्रश्न 6. होमरूल आंदोलन क्या था? इस आंदोलन की प्रगति एवं महत्व का वर्णन करें।

उत्तर – प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अनेक भारतीय नेताओं ने समझ लिया था कि अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार पर जनता का दबाव बनाना आवश्यक है इसलिए एक वास्तविक जन आंदोलन आवश्यक था। ऐसे में 1915 ई. – 1916 ई. में भारत में एक नए प्रकार का आंदोलन आरंभ हुआ जिसे ‘होमरूल आंदोलन’ कहा जाता है। इसके मुख्य नेता श्रीमती एनी बेसेंट तथा बाल गंगाधर तिलक थे।

आंदोलन की प्रगति – श्रीमती एनी बेसेंट आयरलैंड की उदार विचारों की महिला थी। उन्होंने आयरलैंड के होमरूल आंदोलन से प्रभावित होकर 1916 ई. में मद्रास में होमरूल लीग की स्थापना की। शीघ्र ही इसकी शाखाएँ कानपुर, इलाहाबाद, मुंबई, बनारस, मथुरा आदि नगरों में स्थापित हो गई। बाल गंगाधर तिलक ने पूना में तथा श्रीमती एनी बेसेंट ने मद्रास में अपनी अलग-अलग होमरूल लीग स्थापित की थी परंतु वे दोनों राष्ट्रहित में एक दूसरे का सहयोग करने लगे। उन्होंने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण किया और स्थान-स्थान पर लोगों को संबोधित किया और होमरूल का प्रचार किया। इन दोनों नेताओं के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप भारत के विभिन्न नगरों में होमरूल लीग की कई शाखाएँ स्थापित की गई और हजारों की संख्या में लोग होमरूल के सदस्य बन गए।

आंदोलन का महत्व – भारतवासियों में विशेष उत्साह तथा निडरता की भावना देखी गई। बेसेंट और तिलक देश के लोकप्रिय नेता बन गए। इस आंदोलन का प्रभाव देश के बाहर भी हुआ। अमेरिका तथा इंग्लैंड के उदार विचारों के नेता भारत को स्वराज देने का समर्थन करने लगे। भारतीयों को संतुष्ट करने के लिए अगस्त 1917 ई. को भारत मंत्री मांटेग्यू ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की जिसके अनुसार भारतीयों को यह विश्वास दिलाया गया कि स्वशासन संबंधी संस्थाओं का विकास किया जाएगा, प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीयों को अधिक से अधिक संख्या में सम्मिलित किया जाएगा तथा धीरे-धीरे स्वराज स्थापित किया जाएगा।

Important Question Answer

प्रश्न 1. उदारवादी कौन थे?

उत्तर – उदारवादी वे लोग थे जो ब्रिटिश शासन के समर्थक थे। उनका लक्ष्य ब्रिटिश शासन के अधीन ही स्वशासन की प्राप्ति करना था । उदारवादी चाहते थे कि विधान परिषदों में सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए, उनके अधिकारों में वृद्धि की जाए तथा परिषदों के सदस्यों को लोगों द्वारा चुना जाए। उच्च प्रशासनिक सेवाओं में भारतीयों को भी नियुक्त किया जाए।

प्रश्न 2. उदारवादियों एवं राष्ट्रवादियों में मुख्य अंतर क्या थे?

उदारवादी 
  1. इनका लक्ष्य ब्रिटिश शासन के अधीन ही स्वशासन की प्राप्ति करना था।
  2. उदारवादी चाहते थे कि विधान परिषदों में इनके सदस्यों की संख्या बढ़ाई जाए।
  3. उदारवादी लोग सरकार के सामने पूरी नरमी और उदारता से अपनी मांगे रखते थे।
  4. उदारवादी नेता शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक साधनों के पक्ष में थे। 
राष्ट्रवादी
  1. इनका लक्ष्य ब्रिटिश शासन को भारत से उखाड़ फेंकना था।
  2. राष्ट्रवादी विधान परिषद में अपना ही अधिकार चाहते थे।
  3. राष्ट्रवादी लोग सरकार का विरोध करते थे और अपनी मांगे जबरदस्ती मनवाते थे।
  4. राष्ट्रवादी नेता बिना किसी कानून की प्रवाह के देश की आजादी चाहते थे।


प्रश्न 3. बंगाल को विभाजित करने के पीछे अंग्रेजों का क्या उद्देश्य था?

उत्तर – ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन का यह कारण बताया कि बंगाल बहुत बड़ा प्रांत है और उसका प्रशासन सुचारू रूप से चलाना बहुत कठिन है परंतु वास्तव में अंग्रेज़ सरकार भारत में राष्ट्रीय एकता तथा राष्ट्रवादी आंदोलन को कमजोर करना चाहती थी। इस विभाजन का उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम एकता को नष्ट करना था।

प्रश्न 4. स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन के महत्व पर विचार करें।

उत्तर – स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन का भारतीय इतिहास में बहुत महत्व है जिसका वर्णन निम्नलिखित है:-
  • इस आंदोलन से भारतवासियों में राष्ट्रीयता और देशप्रेम की भावना बढ़ने लगी।
  • इस आंदोलन से लोगों में स्वदेशी वस्तुओं का प्रचलन अत्यधिक बढ़ गया।
  • इससे भारतीय उद्योगों का अपार विकास हुआ। इस आंदोलन के फलस्वरूप देश के विभिन्न भागों में कपड़ा मिलें, साबुन और दियासलाई के कारखाने लग गए।
  • स्वदेशी और बहिष्कार आंदोलन ने साहित्य पर विशेष प्रभाव डाला। उस समय राष्ट्रीय विचारों से ओत-प्रोत कई कविताओं, गद्य, गीत आदि की रचना हुई।
  • इस आंदोलन में पहली बार भारतीय महिलाओं ने भी भाग लिया। कई स्थानों पर जुलूसों और धरनों में उन्होंने भाग लिया।
  • स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन ने बंग-भंग के विरुद्ध लोगों को संगठित कर दिया और विवश होकर ब्रिटिश सरकार को 1911 ई. में बंगाल विभाजन रद्द करना पड़ा।

प्रश्न 5. होमरूल आंदोलन क्या था?

उत्तर – प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान अनेक भारतीय नेताओं ने समझ लिया था कि अपने अधिकार प्राप्त करने के लिए ब्रिटिश सरकार पर जनता का दबाव बनाना आवश्यक है इसलिए एक वास्तविक जन आंदोलन आवश्यक था। ऐसे में 1915 ई. – 1916 ई. में भारत में एक नए प्रकार का आंदोलन आरंभ हुआ जिसे ‘होमरूल आंदोलन’ कहा जाता है। इसके मुख्य नेता श्रीमती एनी बेसेंट तथा बाल गंगाधर तिलक थे।

प्रश्न 6. उदारवादियों की मुख्य माँगे क्या थीं?

उत्तर – उदारवादियों की मुख्य माँगें निम्नलिखित थी :-
  • विधान परिषदों की सदस्य संख्या में वृद्धि की जाए।
  • प्रशासनिक सेवा में भारतीयों की नियुक्ति की जाए।
  • सेना के खर्चे में कमी की जाए।
  • सामान्य तथा तकनीकी शिक्षा का विस्तार किया जाए।
  • उच्च पदों पर भारतीयों की अधिक नियुक्ति की जाए।
  • न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग किया जाए।
  • किसानों पर करों का बोझ कम किया जाए।
  • नागरिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो।
  • नमक पर कर में कमी की जाए।
  • प्रेस पर लगाए गए प्रतिबंध हटाए जाएं।

प्रश्न 7. उदारवादियों के प्रमुख नेता कौन थे?

उत्तर – उदारवादियों के मुख्य नेता दादाभाई नौरोजी, व्योमेश चंद्र बनर्जी, बदरुद्दीन तैयबजी, गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव गोविंद रानाडे, सुरेंद्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, रोमेश चन्द्र दत्त, सुब्रमण्यम अय्यर तथा शिशिर कुमार घोष थे।

प्रश्न 8. लाला लाजपत राय का भारतीय स्वतंत्रता में योगदान का वर्णन करें

उत्तर – लाला लाजपत राय भी एक महान राष्ट्रवादी नेता थे जिन्हें ‘शेर-ए-पंजाब’ (पंजाब केसरी) की उपाधि दी गई। उन्होंने ‘वंदे मातरम्’ नामक उर्दू दैनिक तथा ‘द पीपुल’ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक का प्रकाशन किया। इन समाचार पत्रों तथा अन्य लेखों द्वारा उन्होंने लोगों को मातृभूमि की रक्षा हेतु बलिदान देने के लिए प्रेरित किया। 1928 ई. में अपनी मृत्यु तक वे भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेते रहे इस बीच उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उन्होंने ‘होमरूल आंदोलन’ तथा किसानों के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 9. लोकमान्य तिलक की भारतीय स्वतंत्रता में क्या भूमिका थी।

उत्तर – लोकमान्य तिलक ने अंग्रेजी भाषा में ‘मराठा’ तथा मराठी भाषा में ‘केसरी’ नामक समाचार पत्र चलाए। इन समाचार पत्रों के माध्यम से उन्होंने विदेशी शासन की कठोर शब्दों में निंदा की तथा ‘स्वराज’ का जोरदार ढंग से प्रचार किया। उन्होंने 1893 ई. में लोगों में राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार करने के लिए ‘गणपति उत्सव’ को माध्यम बनाना आरंभ किया। 1895 ई. में उन्होंने ‘शिवाजी समारोह’ भी आरंभ करवाया ताकि नवयुवक शिवाजी की महान उपलब्धियों से प्रेरणा लेकर राष्ट्रवाद के उत्साही समर्थक बने। 1896 ई. 1897 ई. में अकाल पड़ने की स्थिति में, महाराष्ट्र के किसानों के द्वारा ‘भूमि कर न देने का अभियान’ तिलक ने चलाया। उन्होंने स्वराज का उद्घोष करते हुए कहा कि “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा।”

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