भारतीय संविधान की उत्पत्ति 1858-1935
भारत के संविधान में सभी नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रावधान मौजूद है। ये प्रावधान उन्हें भी दिये गये है जो भारत के नागरिक नहीं है। इन अधिकारों की पूर्ति के लिये विधायी संस्थानें व्याप्त है। संविधान भारत में लोकतंत्र एवं सामाजिक परिवर्तन की परिकल्पना को पेश करता है। भारतीय संविधान के निर्माण में लोकतांत्रिक संस्थाओं की उत्पत्ति की प्रक्रिया एवं अधिकार संविधान सभा के गठन से पूर्व ही शुरू हो गयी थी। लेकिन यहां यह बताना जरूरी है कि जो लोकतांत्रिक मूल्य एवं लोकतांत्रिक संस्थाएँ उपनिवेश काल में थी उनका मकसद सिर्फ औपनिवेशिक हितों को पूरा करना था जबकि संविधान सभा द्वारा किये गये प्रावधान उनके विपरीत थे। यद्यपि भारतीय संविधान दिसंबर 9, 1947 से लेकर नवंबर 26, 1949 के बीच विचार-विमर्श की उपज है, लेकिन उनकी कुछ विशेषताऐं विभिन्न अधिनियमों द्वारा पारित प्रावधान से मिली है।
भारत शासन अधिनियम 1935, एवं अन्य अधिनियम
ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश शासन हस्तांतरण के बाद, ब्रिटिश संसद ने 1885 से 1935 तक कई शासन अधिनियम लागू किए, जिनमें भारत सरकार अधिनियम 1935 प्रमुख था। इस संदर्भ में पूर्व अधिनियमों ने भारत में केन्द्रीकृत (ब्रिटिश प्रांत) और विकेंद्रीकृत (देशी रियासतें) शासन ढांचा स्थापित किया।
1858 का भारत सरकार अधिनियम
★ भारत में शासन को केन्द्रीकृत (ब्रिटिश प्रांत, प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण) और विकेंद्रीकृत (रियासतें, राजाओं के आंतरिक स्वशासन लेकिन ब्रिटिश अधीनता) विभाजित किया।
★ केन्द्रीकृत ढांचे में सभी शक्तियां भारत सचिव के पास; वह ब्रिटिश राज की ओर से कार्य करता था, सहायता के लिए 15 सदस्यीय मंत्रिमंडल।
★ कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का विभाजन नहीं; वायसराय को कार्यकारी परिषद सहायता, जिला स्तर पर ब्रिटिश प्रशासक।
★ प्रांतीय सरकारों को वित्तीय स्वायत्तता नहीं; 1870 में लॉर्ड मेयो ने प्रांतीय आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रावधान किया।
1909 का भारत परिषद अधिनियम (मॉर्ले-मिंटो सुधार)
★ प्रांतीय विधायिकाओं का विस्तार; पहली बार गैर-सरकारी चुने हुए सदस्य शामिल।
★ मुस्लिम समुदाय को अलग प्रतिनिधित्व (साम्प्रदायिक निर्वाचन)।
1919 का भारत सरकार अधिनियम (मोंटेग्यू-चेल्म्सफोर्ड सुधार)
★ प्रांतीय सरकारों को कुछ सत्ता हस्तांतरण, लेकिन केंद्र का प्रमुख नियंत्रण।
★ केंद्र के नियंत्रण में कमी; प्रशासनिक कार्यक्षेत्रों और राजस्व स्रोतों का विभाजन।
★ ये अधिनियम ब्रिटिश शासन की क्रमिक विकेंद्रीकरण प्रक्रिया दर्शाते हैं, जो 1935 अधिनियम की नींव बने।
भारत सरकार अधिनियम 1935 ब्रिटिश शासन का सबसे विस्तृत कानून था, जिसमें 321 धाराएं और 10 परिशिष्ट थे। यह प्रांतीय स्वायत्तता प्रदान करने और संघीय ढांचे की स्थापना पर केंद्रित था, जो भारतीय संविधान की नींव बना।
मुख्य विशेषताएं
अधिनियम ने अखिल भारतीय संघ की कल्पना की, जिसमें प्रांत और रियासतें शामिल हों, लेकिन रियासतों के शामिल न होने से यह कभी कार्यान्वित नहीं हुआ।
शक्तियों का विभाजन तीन सूचियों में किया:
संघीय (59 विषय, केंद्र के लिए),
प्रांतीय (54 विषय, प्रांतों के लिए) और
समवर्ती (36 विषय, दोनों के लिए); शेष शक्तियां वायसराय को।
प्रांतीय स्वायत्तता
प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर पूर्ण जिम्मेदार सरकार स्थापित की, जहां गवर्नर मंत्रियों की सलाह पर कार्य करता। प्रांतों को वित्तीय स्वतंत्रता और सीधे ब्रिटिश क्राउन से शक्तियां मिलीं, लेकिन गवर्नर को व्यापक विशेष अधिकार (सुरक्षा, अल्पसंख्यक हित) प्राप्त थे। 1937 से यह लागू हुआ।
केंद्र में व्यवस्था
केंद्र में द्वैध शासन का प्रावधान था (आरक्षित और हस्तांतरित विषय), लेकिन यह कभी अमल में नहीं आया। छह प्रांतों (बंगाल, बॉम्बे आदि) में द्विसदनीय विधायिका स्थापित की; मताधिकार विस्तार से 10% आबादी को वोट मिला। संघीय न्यायालय, लोक सेवा आयोग और भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना का प्रावधान किया।
भारत सरकार अधिनियम 1935, में केन्द्र सरकार के गठन का प्रावधान भी था जिसमें राज्य एवं प्रांतों के प्रतिनिधि आते थे। इस प्रकार की सरकार को संघ सरकार कहते थे क्योंकि इसमें राज्य एवं प्रांत दोनों के सदस्य होते थे। लेकिन संघ सरकार की स्थापना नहीं हो सकी क्योंकि राजाओं के बीच संघ में शामिल होने पर सहमति नहीं थी। इस प्रकार इस अधिनियम के अंतर्गत केवल प्रांतीय सरकारों का गठन किया गया और इस अधिनियम के अंतर्गत प्रांतीय विधायिका के चुनाव 1937 में हुए। चुनाव के बाद आठ प्रांतों में कांग्रेस की सरकार बनी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1937 में त्यागपत्र दे दिया। इस तरह एम. गोविन्द राव और निर्विचार सिंह के अनुसार भारत सरकार अधिनियम 1935 ने संविधान सभा के लिए संविधान निर्माण की आधारशिला रखी।

भारत के संविधान को 9 दिसंबर 1946 से नवंबर 1949 के बीच सूत्रद्ध किया गया। इस दौरान संविधान सभा में इसके मसविदे के एक-एक भाग पर लंबी चर्चाएँ चलीं। संविधान सभा के कुल 11 सत्र हुए जिनमें 165 दिन बैठकों में गए।
इसकी संरचना के संबंध में,कैबिनेट मिशन द्वारा अनुशंसित योजना के अनुसार, प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से सदस्यों का चयन किया गया था।
व्यवस्था निम्नानुसार थी:
(i) प्रांतीय विधान सभाओं के माध्यम से 292 सदस्य निर्वाचित किए गए ।
(ii) 93 सदस्यों ने भारतीय रियासतों का प्रतिनिधित्व किया ।
(iii) 4 सदस्यों ने मुख्य आयुक्तों के प्रांतों का प्रतिनिधित्व किया ।
इस प्रकार संविधान सभा की कुल सदस्य संख्या 389 होनी थी।
नेहरू रिपोर्ट: संविधान के मसौदे का प्रथम भारतीय प्रयास
परिचय और पृष्ठभूमि
☆ प्रथम भारतीय प्रयास: नेहरू रिपोर्ट (1928) संविधान के मसौदे का पहला भारतीय प्रयास था।
☆ इससे पहले ब्रिटिश अधिनियमों में भारतीयों की कोई भूमिका नहीं थी।
पूर्व प्रयास: 1921-22 के असहयोग आंदोलन में स्वराज की मांग की गई।
गठन और समिति
☆ अध्यक्ष: मोतीलाल नेहरू (मसविदा समिति के अध्यक्ष)।
☆ निर्णय स्थल: अखिल भारतीय राजनीतिक दलों का सम्मेलन।
☆ सहयोगी दल: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, स्वराज पार्टी, मुस्लिम लीग।
☆ असहयोगी दल: मद्रास की जस्टिस पार्टी, पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी।
मुख्य मांगें
☆ मताधिकार: पुरुषों और महिलाओं के लिए सार्वभौमिक मताधिकार।
☆ सरकार: केंद्र और प्रांतों में जिम्मेदार सरकार।
☆ प्रभुत्व शासन: पूर्ण आजादी की बजाय ब्रिटिश नियंत्रण में सीमित कानून बनाने की स्वतंत्रता (डोमिनियन स्टेटस)।
☆ सूचियां: केंद्र-प्रांत विषयों की सूची; मौलिक अधिकारों की सूची।
बाद का विकास
☆ कांग्रेस की मांग: 1934 में कांग्रेस ने बिना बाहरी हस्तक्षेप के पूर्ण संविधान की आधिकारिक मांग की।
क्रिप्स मिशन
प्रारंभ में औपनिवेशिक शासकों ने भारत के संविधान निर्माण की माँग को ठुकरा दिया था। लेकिन बदली हुई परिस्थितियों, द्वितीय विश्व युद्ध की आहट और ब्रिटेन में नई सरकार के गठन ने भारत में ब्रिटिश सरकार को नये संविधान निर्माण को मजबूर कर दिया। 1942 में ब्रिटिश सरकार ने अपना केबिनेट सदस्य सर स्टेफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। वे एक ड्राफ्ट प्रस्ताव लेकर आये थे जिसमें भारत के संविधान के गठन की बात थी। यह प्रस्ताव द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् लागू किया जाना था। लेकिन इसके लिये मुस्लिम लीग एवं कांग्रेस दोनों की सहमति आवश्यक थी।
क्रिप्स मिशन के ड्राफ्ट प्रस्ताव में निम्न सिफारिशें थी
(1) भारत को प्रभुत्व (डोमिनियन) का दर्जा प्रदान करना
(2) सभी प्रांत एवं राज्यों को मिलाकर भारतीय संघ का गठन करना
(3) निर्वाचित संविधान सभा के द्वारा भारत के संविधान की रचना करना
लेकिन जो प्रांत संविधान को स्वीकार करने को तैयार नहीं थे उन्हें अपनी वास्तविक स्थिति बरकरार रखने की छूट थी। इन प्रांतों को अलग संविधानिक प्रबंधों को अपनाने की छूट थी।
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने ही क्रिप्स मिशन के प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया। मुस्लिम लीग ने भारत को सांप्रदायिक आधार पर बाँटने की माँग की जिसमें उसने कुछ प्रांतों को स्वतंत्र पाकिस्तान राज्य बनाने की माँग की। उनकी माँगें थी कि भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए दो अलग-अलग संविधान सभा होनी चाहिए।
केबिनेट मिशन
ब्रिटिश शासन ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के बीच मतभेदों को दूर करने के कई प्रयास किये। लेकिन वह असफल रही। ब्रिटिश सरकार ने केबिनेट सदस्यों को दूसरा प्रतिनिधित्व भेजा जिसे केबिनेट प्रतिनिधित्वि कहा गया तथा बाद में वह कैबिनेट मिशन योजना के रुप में सामने आया जिसमें तीन कैबिनेट मंत्री शामिल थे
(1) लॉर्ड पौथिक लारेंस,
(2) सर स्टैफोर्ड क्रिप्स एवं
(3) ए. वी. अलैक्जेण्डर।
कैबिनेट मिशन भी कांग्रेस और मुस्लिम लीग को एक समझौते पर लाने में असफल रही। लेकिन इसने अपना एक प्रस्ताव तैयार किया जिसे 16 मई 1946 को इंग्लैण्ड और भारत में समान तौर पर घोषित किया। कैबिनेट प्रतिनिधित्व ने निम्न सिफारिशें की ब्रिटिश इंडिया और राज्यों को मिलाकर एक भारत संघ होना चाहिए। इसके पास रक्षा, विदेश मामले एवं संचार के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार हो। बाकी अवशिष्ट अधिकार प्रांतों एवं राज्यों के पास होना चाहिए। संघ के पास कार्य प्रक्रिया एवं विधायिका होनी चाहिये। इसमें प्रांत एवं राज्यों के प्रतिनिधि होने चाहिये लेकिन अहम सांप्रदायिक मुद्दों पर विधायिका को निर्णय लेने का अधिकार है। इसमें उपस्थित सदस्यों के मत द्वारा बहुमत के आधार पर फैसला किया जाता है। प्रांतों को कार्यपालिका एवं विधायिका के साथ समूह बनाने की छूट थी। सभी समूह प्रांतों के विषयों को निर्धारित करने को आजाद है जो किसी समूह संगठन द्वारा उठाये गये हो।
संविधान सभा का चुनाव
केबिनेट मिशन के प्रस्ताव के अनुसार संविधान सभा के चुनाव कराये गये जिसमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सदस्यों को वापस लिया गया। संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधायी सभा द्वारा किया गया। कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के बीच केबिनेट मिशन के समूह खंड के उपर विवाद दिखाई दिये। ब्रिटिश सरकार ने इसमें दखल देकर स्थिति स्पष्ट की और बताया कि मुस्लिम लीग के तर्क सही थे।
6 दिसंबर, 1946 को ब्रिटिश सरकार ने एक विवरण प्रकाशित किया जिसमें दो विधान क्षेत्र एवं दो राज्यों की संभावना को उजागर किया। इसके परिणामस्वरुप, संविधान सभा की प्रथम बैठक जो 9 दिसंबर 1946 को बुलाई गयी उसका मुस्लिम लीग ने बहिस्कार किया और इसने मुस्लिम लीग की उपस्थिती के बिना कार्य किया।
तथापि, 3 जून, 1947 की माउंटबेटन योजना के तहत विभाजन के परिणामस्वरूप पाकिस्तान के लिए एक अलग संविधान सभा की स्थापना की गई और कुछ प्रांतों के प्रतिनिधि सभा के सदस्य नहीं रहे। । इसके परिणामस्वरूप, संविधान सभा की सदस्य संख्या घटकर 299 रह गई।
संविधान सभा के प्रतिनिधित्व की प्रकृति
प्रायः यह दलील दी जाती है कि संविधान सभा के अंतर्गत भारत के आम नागरिकों का प्रतिनिधित्व नहीं था। क्योंकि इसके प्रतिनिधि सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार से निर्वाचित नहीं हुए थे। बल्कि वे अप्रत्यक्ष रूप से समाज के विशिष्ट वर्गों द्वारा प्रतिबंधित निर्वाचन प्रक्रिया से चुने गये थे। ये विशिष्ट वर्ग शिक्षित और आयकर अदा करने वाले थे। ग्रेनविल ऑस्टिन के अनुसार इसका प्रमुख कारण कैबिनेट मिशन योजना की रणनीति थी ताकि संविधान निर्माण की प्रक्रिया की गति को धीमा होने से बचाया जा सके। कैबिनेट मिशन ने संविधान सभा में अप्रत्यक्ष चुनाव का प्रावधान किया। इसका चुनाव प्रांतीय विधायिका के सदस्यों द्वारा किया गया। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को मान लिया ताकि संविधान सभा के चुनाव वयस्क मताधिकार से हो सके। प्रतिबंधित वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित होने के बावजूद संविधान सभा के अंतर्गत सभी धर्मों एवं वर्गों की राय को संविधान सभा में प्रतिनिधित्व मिला। ऑस्टिन ने यह दावा किया कि संविधान सभा में यद्यपि कांग्रेस का बहुमत था फिर भी यह विश्वास था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को सामाजिक एवं वैचारिक स्तर पर विविधताओं का प्रतिनिधित्व करना चाहिये। उनकी यह भी नीति थी कि संविधान सभा में विभिन्न अल्पसंख्यक समुदाय के दृष्टिकोण को महत्व दिया जाये। संविधान सभा में विभिन्न विचारधाराओं के सदस्य थे तथा तीन धार्मिक समुदाय के सदस्य भी थे उनमें सिख, मुस्लिम, हिन्दु एवं पारसी इत्यादि थे। के. सान्ताराम के शब्दों में कोई ऐसी विचारधारा नहीं थी जिसका कि विधानसभा में प्रतिनिधित्व न हो (देखें ऑस्टेन, 2012, पेज नं. 13, फुट नोट 48)। संविधान सभा के ज्यादातर सदस्य भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। इनमें एक दर्जन से अधिक गैर कांग्रेसी सदस्य भी शामिल थे। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:- ए. के. अय्यर, एच. एन. कुन्जरु, एन. जी. आयंगर, एस. पी. मुखर्जी, और डा. बी. आर. अम्बेडकर। एस. पी. मुखर्जी हिन्दू महासभा के प्रतिनिधि थे। संविधान सभा में देशी राज्यों के प्रतिनिधी भी शामिल थे। यहाँ पर यह समझने की जरूरत है कि डा. अंबेडकर पहली बार बंगाल से अनुसूचित जाति संघ से संविधान सभा में चुनकर आये थे। लेकिन वे बंगाल के विभाजन के कारण इस सीट से चुनाव हार गये और वे फिर से बंबई नेशनल कांग्रेस से चुने गये। वे कांग्रेस हाई कमान के निवेदन के पश्चात् चुनकर आये थे। संविधान सभा को सभी व्यक्तियों का ध्यान रखना था चाहे वे किसी भी सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव से क्यों न हो। संविधान में किसी भी प्रावधान को शामिल करने हेतु संविधान सभा में काफी विचार-विमर्श हुआ। इस प्रकार संविधान सभा के सदस्य अपनी कमजोरियों को दूर कर सकते थे क्योंकि वे प्रतिबंधित मताधिकार से चुनकर आये थे। आप इकाई संख्या तीन में संविधान की प्रस्तावना के बारे में पढ़ेंगे, संविधान सभा ने संविधान में लोकतांत्रिक मूल्यों को शामिल करने का प्रयास किया। संविधान सभा ने हमारे संविधान में विश्व के विभिन्न संविधानों से कई प्रकार के प्रावधान अपनाने की कोशिश की। ऑस्टिन का तर्क था कि संविधान सभा ने अन्य देशों से लिये गये प्रावधानों को भारत के संदर्भमें अपनाने की कोशिश की। संविधान सभा के ज्यादातर सदस्यों ने इसकी कार्यवाही में हिस्सा लिया। लेकिन इनमें से 20 ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने इसमे अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनमें से कुछ व्यक्ति इस प्रकार है:- राजेन्द्र प्रसाद, मौलाना आजाद, वल्लभ भाई पटेल, जवाहर लाल नेहरू, गोविन्द वल्लभ पंत, पी. सीता रमैया, ए. के. अयर, एन. जी. आयंगर, के. एम. मुन्शी, डा. बी. आर. अम्बेडकर और सत्यनारायण सिन्हा। हालांकि संविधान सभा ही एक ऐसा मंच था जिसमें सारी कार्यवाही हुई एवं वार्तालाप हुआ लेकिन इसके अलावा तीन अन्य निकाय थी जिसमें भी विचार-विमर्श हुआ। ये तीन निकाय थे, संविधान सभा, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तथा अंतरिम सरकार। संविधान सभा के कुछ सदस्य अन्य निकायों के भी सदस्य थे। ऑस्टिन का मानना था कि संविधान में चार ऐसे लोग थे जिनका पूरी सभा में आधिपत्य था तथा वे सभा में सबसे सम्मानीय एवं इज्जतदार लोग थे। ये चार व्यक्ति थे- नेहरू, पटेल, प्रसाद एवं आजाद। उनकी संविधान सभा की कार्यवाही में अहम भूमिका थी। इनमें कुछ सरकार, कांग्रेस पार्टी एवं संविधान सभा में थे। प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष बनने से पूर्व कांग्रेस पार्टी के भी अध्यक्ष थे। जबकि पटेल एवं नेहरू दोनों ही प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री थे। वे संविधान सभा की आंतरिक समिति के हिस्सा थे। संविधान सभा की एक प्रारूप समिति थी जिसने संविधान के प्रारूप को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। डा. बी. आर. अंबेडकर प्रारूप समिती के अध्यक्ष थे और उन्होंने संविधान के प्रारूप को तैयार करने में अग्रणी भूमिका अदा की। डा. अंबेडकर के इस कार्य की सराहना करने हुए टी. टी. कृष्णामचारी जो इस समिती के सदस्य थे उन्होंने एक भाषण के दौरान ये बातें कही :-
"आप सभी को शायद मालूम होगा कि सदन ने सात सदस्यों को मनोन्नति किया जिसमें से एक सदस्य ने इस्तीफा दे दिया। एक सदस्य की मृत्यु हो गयी। एक सदस्य अमेरिका में थे तथा एक और अन्य सदस्य राज्य के कार्यों में व्यस्त थे। एक या दो व्यक्ति दिल्ली से काफी दूर थे तथा उनका स्वास्थ्य भी उन्हें बैठक में आने से रोक रहा था। आखिरकार संविधान के प्रारूप को तैयार करने का भार डा. अंबेडकर के कंधों पर आ गया। और मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने इस कार्य को बखूबी पूरा किया जो कि सराहनीय है।"
डा. अंबेडकर ने अपनी तरफ से इसका श्रेय एस. एन. मुकर्जी, बी.एन. राव और उनके असिसटेंट को दिया जो प्रारुप समिति के अफसर थे। डॉ. अम्बेडकर के अनुसार मुकर्जी ने संविधान को अच्छे शब्दों में व्यक्त किया था ।
संविधान निर्माण में संविधान सभा की भूमिका 1946-1949
संविधान सभा के गठन का उद्घाटन सत्र 9 दिंसबर, 1946 को आयोजित किया गया। इसमें सभी 296 सदस्यों को भाग लेना था लेकिन इनमें से मात्र 207 सदस्यों ने ही हिस्सा लिया क्योंकि मुस्लिम लीग के सदस्यों ने इसका बहिष्कार किया था। जैसा पहले भी बताया जा चुका है उन्होंने संविधान सभा का बहिस्कार किया था। इस सभा में आचार्य कृपलानी ने डा. सच्चिदानंद सिन्हा से निवेदन किया कि वे इसके अस्थायी अध्यक्ष बन जाए। बाद में सभी सदस्यों ने एक प्रस्ताव पास किया 10 दिसंबर 1946 को स्थायी अध्यक्ष के चुनाव के लिए। उसके अगले दिन यानि 11 दिसंबर 1946 को डा. राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थायी अध्यक्ष चुन लिया गया। 13 दिसंबर 1946 को जवाहर लाल नेहरू ने एक प्रस्ताव पेश किया जिसमें इसके लक्ष्य एवं उद्देश्य शामिल थे।
संविधान सभा द्वारा सुचारू रूप से कार्य करने के लिए गठित कई महत्वपूर्ण समितियों, उनके अध्यक्षों और सदस्यों की संख्या का विवरण दिया गया है।
- केंद्रीय शक्तियां समिति: जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में, जिसमें नौ अन्य सदस्य थे।
- मौलिक अधिकार और अल्पसंख्यक समिति: सरदार वल्लभभाई पटेल की अध्यक्षता में, 54 सदस्य।
- संचालन समिति: डॉ. के.एम. मुंशी की अध्यक्षता में, जिसमें कुल तीन सदस्य हैं।
- प्रांतीय संविधान समिति: सरदार पटेल की अध्यक्षता में, 25 सदस्य।
इन समितियों की रिपोर्ट पर चर्चा करने के पश्चात् संविधान सभा ने 29 अगस्त 1947 को एक प्रारूप समिति का गठन किया। इस समिति का अध्यक्ष डा. अंबेडकर को बनाया गया। डाफ्ट (प्रारूप) को सर बी. एन. राव ने तैयार किया जो संविधान सभा के सलाहकार थे। प्रारूप को समझने के लिए एवं उसका परीक्षण करने के लिये 7 सदस्यीय समिति का गठन किया गया। डा. अंबेडकर जो उस समय कानून मंत्री भी थे और इस समिति के अध्यक्ष भी थे उन्होंने इस प्रारूप को संविधान सभा में पेश किया। डा. अंबेडकर ने 'भारतीय संविधान के प्रारूप' को प्रस्तुत किया। संविधान के प्रारूप का फरवरी 1948 में प्रकाशन हुआ। संविधान सभा ने इस प्रारूप को कई सत्रों में चर्चा की और यह अक्तूबर 17, 1949 को पूरा हुआ। इस चर्चा को हम द्वितीय पाठन भी कहते है। संविधान सभा फिर से 14 नवंबर 1949 को मिली और प्रारूप पर चर्चा की। इसे तृतीय पाठन कहते हैं। 26 नवंबर 1949 को इसको अंतिम रूप प्रदान किया गया तथा संविधान सभा के अध्यक्ष के पास हस्ताक्षर के लिए भेज दिया गया। इस प्रकार 26 नवंबर 1949 को संविधान को अपनाया गया तथा ठीक दो महीने पश्चात् 26 जनवरी 1950 को इसे लागू किया गया।
संविधान की प्रमुख विशेषताएं
भारतीय संविधान की कुछ प्रमुख विशेषताऐं है। ये विशेषताऐं ही भारतीय संविधान को एक मुख्य पहचान प्रदान करती है। भारत का संविधान विश्व के विभिन्न संविधानों की विशेषताओं पर आधारित है।
डा. अंबेडकर के अनुसार "विश्व के प्रसिद्ध संविधानों को टटोलने के पश्चात् ही इसे तैयार किया गया।
- मौलिक अधिकारों (इकाई) 4 का अध्याय अमेरिकी संविधान से लिया गया है।
- संसदीय प्रणाली ब्रिटिश संविधान से अपनायी गयी है,
- राज्य के नीति निर्देशक तत्व (इकाई 5) आयरलैण्ड के संविधान से लिये गये हैं।
- आपातकालीन प्रावधान (इकाई 11) वैमार (जर्मन)
- संविधान तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 से ग्रहण किये गये हैं।
ये सभी विशेषताऐं जो अन्य संविधानों से ली गयी थी उन्हें देश की जरूरतों के हिसाब से परिवर्तित किया गया है। यह सबसे लंबा लिखित संविधान है।
इसके गठन के समय इसमें 395 अनुच्छेद एवं आठ अनूसुचियां थी।
यह अधिकारों के सुरक्षित प्रदान करने की बात करता है। इसमें मौलिक अधिकार एवं राज्य के नीति निर्देशक सिंद्धात शामिल है। संविधान निर्माताओं ने पृथक निर्वाचक के बजाय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को प्राथमिकता दी।
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार एवं पृथक निर्वाचक की समाप्ति
मौलिक अधिकारों को शामिल करने के लिए बनी उप-समिति में बहस करने के पश्चात् इन्हें संविधान में शामिल करने की सिफारिश नहीं की। बल्कि समिति ने संविधान के भाग तीन में रखने पर आपत्ति जताई और कहा कि इन्हें संविधान के किसी दूसरे स्थान में जगह दी जानी चाहिये। ऐसी ही एक उदाहरण है सार्वभौमिक मताधिकार और गुप्त एवं समय बद्ध चुनाव। उप समिति सार्वभौमिक मताधिकार के पक्ष में थी लेकिन उसने सुझाव दिया कि इन्हें मौलिक अधिकारों का भाग नहीं बनाया जाना चाहिये।
इस प्रकार इन्हें संविधान के भाग 15 के अंतर्गत अनुच्छेद 326 में रखा गया। हालांकि अनुच्छेद 326 से "सार्वभौम" शब्द गायब है। लेकिन यह सत्य है कि देश के सभी वयस्क नागरिक जिन्हें वोट देने का अधिकार है वह एक प्रकार से "सार्वभौमिक" वयस्क मताधिकार माना जाता है। भारतवासियों को वयस्क मताधिकार मिलने से पहले स्वतंत्रता आंदोलन के वरिष्ठ नेताओं ने पृथ निर्वाचक की समाप्ति के लिये आंदोलन किया।
ब्रिटिश सरकार ने भारत में 1909 के मार्ले मिन्टो सुधार से लेकर 1932 के 'कम्युनल अवार्ड' तक पृथक निर्वाचक प्रक्रिया को जारी रखा। 'कम्युनल अवार्ड' का मुख्य उद्देश्य था मुस्लिम, सिख, ईसाई, यूरोपियन और ऐंग्लों इंडियन्स को पृथक निर्वाचक घोषित करना। इसने पिछड़े वर्गों को भी सीटें प्रदान की जिन्हें चुनाव में विशेष क्षेत्रों में पूरा किया जाना था। इन चुनाव क्षेत्रों में केवल पिछड़े वर्गों को ही मताधिकार प्राप्त था। इसके साथ पिछड़ें वर्गों को सामान्य सीटों पर भी वोट देने को अधिकार प्राप्त था। गाँधी जी ने इस प्रकार की सिफारिशों का कड़ा विरोध किया। इनके विरोध में वे 1932 में आमरण अनशन पर बैठ गये। गाँधीजी के भूख हड़ताल पर बैठने का डा. अंबेडकर ने विरोध किया। इसके बाद गाँधी और अंबेडकर दोनों के बीच पूना समझौता हुआ। पूना पैक्ट के अनुसार पिछड़े वर्गों को सामान्य सीटों में सीटें आरक्षित कर दी गयी।
सारांश
संविधान निर्माण के मुख्यतौर पर दो चरण थे। प्रथम 1857 से 1935 तथा दूसरा 1946 से 1949. ब्रिटिश राजशाही को सत्ता मिलने के पश्चात् ब्रिटिश सरकार के शासन के विभिन्न अधिनियम लागू किये। इनमें भारतीयों को भी विभिन्न शासन के संस्थानों के प्रतिनिधित्व दिया गया। इसका मूल मकसद था अपनी उपनिवेश हितों को पूरा करना न कि लोकतांत्रिक अधिकारों को प्रदान करना। मार्ले-मिंटो सुधार 1909 एवं 1932 के कम्युनल अवार्ड के माध्यम से कम्युनल प्रतिनिधित्व को लागू किया जिसका स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने विरोध किया। गाँधीजी की भूख हड़ताल के बाद पूना समझौता हुआ जिसमें पृथक निर्वाचक प्रणाली को समाप्त किया गया तथा प्रांतीय विधानमंडल में पिछड़ें वर्गों को आरक्षण दिया गया। बदली हुई परिस्थितियों और कांग्रेस की माँग के कारण संविधान निर्माण की प्रक्रिया तेज हुई। ब्रिटिश सरकार ने अंततः भारतीयों के लिए एक संविधान सभा का गठन किया। संविधान सभा में केबिनेट मिशन की सिफारिशों के पश्चात् प्रांतीय विधानमंडल से चुनाव करवाये गये। समाज के विशिष्ट वर्गों के निर्वाचन के बावजूद संविधान सभा में विभिन्न विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व था। इसमें विभिन्न सामाजिक समूहों का भी प्रतिनिधित्व था। संविधान सभा ने सभी मुद्दों पर गहराई से विचार-विमर्श किया उसके पश्चात् ही किसी खास निष्कर्ष पर पहुँची। संविधान सभा में विभिन्न उप-समितियों के सुझाव एवं निर्णय को अंततः संविधान में शामिल कर लिया गया। भारत का संविधान एक ऐसा दस्तावेज है जो एक सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि को प्रचलित करता है। संविधान के कुछ महत्वपूर्ण सिद्धांत है जैसे उदार लोकतंत्र धर्म निरपेक्षता एवं सामाजिक लोकतंत्र के कुछ तत्व। यह व्यक्तियों एवं समुदायों को उनके सांस्कृतिक, भाषायी, तथा धार्मिक अधिकारों की रक्षा की को सुनिश्चित करता हैं।
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