Class 12 History इतिहास (हरियाणा बोर्ड) अध्याय 10. विद्रोह और राज Notes
- 10 मई 1857 ई० से यह विद्रोह मेरठ छावनी से आरम्भ हुआ था। सिपाहियों ने शस्त्रागार पर कब्जा कर लिया था।
- सैनिक 11 मई को दिल्ली पहुँच गए तथा उन्होंने बहादुरशाह जफर (मुगल शासक) को क्रांति का नेता बनाया।
- फिरंगी फारसी भाषा का शब्द है जो संभवतः फ्रैंक से निकला है। इसे उर्दू और हिंदी में पश्चिमी लोगों का मजाक उड़ाने के लिए कभी-कभी इसका प्रयोग अपमानजनक दृष्टि से भी किया जाता है।
- सिपाहियों ने किसी न किसी विशेष संकेत के साथ अपनी कार्यवाही शुरू की।
- सिपाहियों ने सरकारी खजाने को लूटा, जेल, टेलीग्राफ, दफ्तर, रिकॉर्ड रूम, बंगलों, तमाम सरकारी इमारतों पर हमला किया और सारे रिकॉर्ड जलाते चले गए।
- विद्रोह में आम लोगों के भी शामिल हो जाने के साथ-साथ हमलों का दायरा फैल गया।
- सिपाहियों ने तथा किसानों ने हर उन लोगों के ऊपर हमले किए जिन्हें वो अंग्रेजों का वफ़ादार मानते थे।
- अलग-अलग स्थानों पर विद्रोह के ढरें में समानता की बजाय आशिक रूप से उसकी योजना और समन्वय में निहित थी।
- सिपाही या उनके संदेशवाहक एक जगह से दूसरी जगह जा रहे थे। लोग बस विद्रोह की ही तैयारी कर रहे थे।
- सिपाही एक योजना और समन्वय की नीति के साथ कार्य कर रहे थे। सामूहिक रूप से फैसले लिए जा रहे थे। एक सैनिक टुकड़ी के सैनिक दूसरी सैनिक टुकड़ी से सम्पर्क साध रहे थे।
- अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए नेतृत्व और संगठन आवश्यक था। इसके लिए विद्रोहियों ने पुराने शासकों जैसे झांसी में रानी लक्ष्मीबाई, लखनऊ में बेगम हजरत महल, दिल्ली में मुगल शासक बहादुर शाह जफर, कानुपर में नाना साहिब आदि राजनीतिक नेताओं से नेतृत्व की गुहार लगाई।
- अन्य स्थानों पर किसानों, जमींदारों और आदिवासियों को विद्रोह के लिए उकसाते हुए कई स्थानीय नेता सामने आ चुके थे। शाहमल ने उत्तर प्रदेश में बड़ौत परगना के गाँव वालों को संगठित किया।
- छोटा नागपुर स्थित सिहंभूम के एक आदिवासी काश्तकार गोनू ने इलाके के कोल आदिवासियों का नेतृत्व सँभाला हुआ था।
- मौलवी अहमदुल्लाह शाह 1857 के विद्रोह में अहम भूमिका निभाने वाले बहुत सारे मौलवियों में से एक थे। मौलवी साहब को उनकी ताकत और बहादुरी के लिए जाना जाता था। वे डंका शाह के नाम से भी प्रसिद्ध थे।
- तरह-तरह की अफ़वाहों और भविष्यवाणियों के द्वारा लोगों को विद्रोह में शामिल करने के लिए तैयार किया जा रहा था। चर्बी वाले कारतूस की घटना से सैनिक आग बबूला हो गए।
- 1857 की शुरुआत तक उत्तर भारत में एक अफवाह भी जोरों पर थी कि अंग्रेज सरकार ने हिंदुओं और मुसलमानों की जाति और धर्म को नष्ट करने के लिए एक भयानक साजिश रच ली हैं। बाजार में मिलने वाले आटे में गाय और सुअर की चर्बी मिली हुई थी। सिपाहियों और आम लोगों ने बाजार के आटे को छूने से भी मना कर दिया।
- अंग्रेजों ने सती प्रथा को खत्म करने (1829) और हिंदू विधवा विवाह की वैधता देने के लिए कानून बनाए।
- लार्ड डलहौजी ने विलय की नीति के द्वारा झाँसी और सतारा जैसी बहुत सारी रियासतों को अपने साम्राज्य में मिला लिया था।
- इस विद्रोह की सबसे ज्यादा व्यापकता अवध में देखने को मिलती है। अवध को बंगाल आर्मी की पौधशाला भी कहा जाता है। अवध पर वाजिद अली शाह का शासन था जो एक लोकप्रिय शासक था।
- अवध को लार्ड डलहौजी ने कुशासन का आरोप लगाकर 1856 में भारत को अंग्रेजी शासन में मिला लिया
- शासक वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाकर कलकता निस्कासित कर दिया गया।
- 1856 ई० में एकमुश्त बंदोबस्त के द्वारा ताल्लुकदारों से जमीने वापिस ली जाने लगी। ताल्लुकदारों को केवल बिचोलि के रूप में माना गया।
- विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग था।
- 'खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी' पक्तियाँ सुभद्रा कुमारी चौहान ने कही थी।
- झांसी का अंग्रेजी सामान्य में विलय लॉर्ड डलहौजी के द्वारा 1853 ई० में किया गया था।
- 1857 ई० के विद्रोह को ' भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम' धीर सावरकर ने कहा था।
- 'द ग्रेट रिबेलियन' नामक पुस्तक के लेखक अशोक मेहता थे।
- मंगल पांडे बैरकपुर छावनी का सैनिक था जिसे भारत का प्रथम शहीद भी कहा जाता है। उन्हें 8 अप्रैल 1857 को फांसी दी गई थी।
- सहायक संधि लार्ड वेलेजलि द्वारा लागू की गई थी। अवध में 1801 ई० में सहायक संथि लागू की गई थी।
- 'द रिलीफ ऑफ लखनऊ' नामक चित्र टॉमस जोनस बार्कर ने 1859 ई० में बनाया था।
- 'इन मेमोरियम' चित्र जोजेफ नोएल पेटन ने 1859 ई० में बनाया था।
- उत्तराधिकार कानून 1850 ई० में बनाया गया था, इस कानून के द्वारा यदि कोई व्यक्ति अपना धर्म बदलता है तो उसे
- उसकी पैतृक संपति से बेदखल नहीं किया जा सकता था।
- भारत से ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन 1858 ई० में समाप्त हुआ था।
- झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की मृत्यु 17 जून, 1858 में हुई थी।
- आजमगढ़ घोषणा 25 अगस्त 1857 ई० को हुई थी। इस घोषणा से विद्रोहियों के उद्देश्यों के विषय में जानकारी प्राप्त होती है।
- 'देह से जान जा चुकी थी, शहर की काया बेजान थी' शब्द अवध के नवाब वाजिद अली शाह के बारे में कहे गए थे।
- भारतीय सेना में एनफील्ड राईफल्स का प्रचलन 1856 में हुआ था।
- 'सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम' सन 1856 में लागू किया गया था। इस अधिनियम के द्वारा भारतीय सैनिकों को युद्ध लड़ने के लिए विदेश भेजा जा सकता था। भारतीय सैनिकों ने इस कानून का विरोध किया था।
- ब्रिटिश सरकार ने कई दमनकारी कदम उठाकर इस विद्रोह को दवा दिया गया। मार्शल लॉ लगाकर, जनता में खौफ पैदा करने के लिए सरेआम सजाएं देना, हिन्दू-मुस्लिम में फूट डालकर आदि तरीकों से इस विद्रोह को दबा दिया गया।
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- 1757 में प्लासी की लड़ाई और 1857 के विद्रोह के बीच ब्रिटिश शासन ने भारत में अपने एक सौ वर्ष पूरे कर लिये थे।
- भारत में ब्रिटिश शासन के प्रथम सौ वर्षों में कई बार ब्रिटिश सत्ता को भारतीयों से चुनौतियाँ मिली जिसमें अनेक सैनिक उपद्रव, स्थानीय बगावतें शामिल थी।
- इस समय के अधिकांश आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरूद्ध व्यापक असन्तोष तथा व्यक्तिगत शिकायतों के कारण हुए।
- जहाँ एक ओर अंग्रेजी प्रशासन द्वारा विस्थापित शासकों तथा सामंतों ने अपनी प्रजा अथवा सैनिकों की सहायता से अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा को प्राप्त करने का प्रयास किया वहीं सरकार के विरूद्ध किसानों का असन्तोष उनकी भू-राजस्व नीति के कारण था, जिनमें बिचौलियों ने आदिवासियों का शोषण किया। भारत में अंग्रेजी नीति के विरूद्ध पनप रहे असन्तोष का शायद शासक वर्ग को पूर्वाभास हो चुका था।
- इसीलिए कभी कैनिंग ने यह आशंका व्यक्त की थी कि "हमें यह कदाचित नहीं भूलना चाहिए कि भारत के इस शांत आकाश में कभी भी एक छोटी सी बदली उत्पन्न हो सकती है जिसका आकार पहले तो मनुष्य की हथेली से बड़ा नहीं होगा, किन्तु जो उत्तरोत्तर विराट रूप धारण करके अंत में वृष्टिस्फोट के द्वारा हमारी बर्बादी का कारण बन सकती है।" 1857 के विद्रोह के फटने से पूर्व ही भारत में कई स्थानों पर विद्रोह के स्वर फूटने लगे थे जो इस प्रकार हैं-
- 1764 में बक्सर के युद्ध के समय हैक्टर मुनरो के नेतृत्व में लड़ रही सेना के कुछ सिपाही विद्रोह कर मीरकासिम से मिल गये।
- 1806 ई० में बेल्लोरमठ में कुछ भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों द्वारा अपने सामाजिक, धार्मिक रीति रिवाजों में हस्तक्षेप के कारण विद्रोह कर मैसूर के राजा का झण्डा फहराया।
- 1842 में वर्मा युद्ध के लिए भेजी जाने वाली ब्रिटिश भारत की सेना की 47वीं पैदल सैन्य टुकड़ी के कुछ सिपाही उचित भत्ता न मिलने के कारण विद्रोह कर दिया।
- 1825 में असम स्थित तोपखाने में विद्रोह हुआ।
- 1844 में 34वीं एन०आई० तथा 64वीं रेजिमेंट के सैनिकों ने उचित भत्ते के अभाव में सिन्ध के सैन्य अभियान पर जाने से इंकार कर दिया।
- 1849-50 में पंजाब स्थित गोविन्दगढ़ की एक रेजिमेन्ट विद्रोह पर उतर आई।
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