HBSE Class 12 History इतिहास (हरियाणा बोर्ड) अध्याय 6. भक्ति-सूफी परंपराएँ Exercise Solution

 अध्याय 6. भक्ति-सूफी परंपराएँ Exercise Solution

प्रश्न - 1. उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं?

उत्तर - 

इतिहासकार जब 'संप्रदाय के समन्वय' की बात करते हैं, तो उनका आशय उस प्रक्रिया से होता है जिसमें विभिन्न पूजा पद्धतियाँ और धार्मिक विचार आपस में घुलने-मिलने लगते हैं। लोग एक-दूसरे के विचारों, विश्वासों और प्रथाओं को अपनाना शुरू कर देते हैं। 

उदाहरण:

पुरी में जगन्नाथ का स्थानीय देवता: 

  • इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण ओडिशा के पुरी में देखने को मिलता है, जहाँ के स्थानीय देवता जगन्नाथ को विष्णु का एक रूप माना गया। 

देवी संप्रदायों का समन्वय: 

  • देवी की उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थरों के रूप में की गई, जहाँ शाक्त धर्म का प्रचलन था। यहाँ स्थानीय देवी-देवताओं को ब्राह्मणवादी परंपरा में शामिल किया गया। 

मुगल काल में हिंदू-मुस्लिम समन्वय: 

  • मुगल काल में अकबर की धार्मिक सहिष्णुता की नीति ने हिंदू और मुस्लिम संप्रदायों के बीच सहयोग को बढ़ावा दिया, जिससे साम्राज्य में शांति और विकास हुआ। 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम: 

  • विभिन्न जाति, धर्म और भाषा के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई लड़ी, जो संप्रदायों के समन्वय का एक बड़ा उदाहरण था। 

वैष्णव संप्रदाय में भक्ति: 

  • हिन्दू धर्म के वैष्णव संप्रदाय में राधा-कृष्ण की भक्ति और रामानंद संप्रदाय में राम की भक्ति, दोनों में भक्ति का भाव समान है, जो एक मूलभूत समन्वय दर्शाता है।

प्रश्न 2. किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है?

उत्तर – 

हाँ, उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है। उपमहाद्वीप में मस्जिदों की वास्तुकला स्थानीय परंपराओं और इस्लामी सिद्धांतों के बीच अंतर्संबंध को दर्शाती है। 

सार्वभौमिक आदर्श: 

  • सभी मस्जिदों में कुछ सामान्य इस्लामी विशेषताएँ होती हैं, जैसे कि एक खुला प्रार्थना कक्ष, एक मेहराब (प्रार्थना की दिशा दिखाने वाली दीवार में एक आला), और एक मीनार जहाँ से अज़ान दी जाती है। 

स्थानीय परिपाटी: 

  • निर्माण में प्रयुक्त सामग्री और शैली में क्षेत्रीय भिन्नताएँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। उदाहरण के लिए, केरल में, 13वीं शताब्दी की कई मस्जिदों की छतें स्थानीय मंदिर वास्तुकला की तरह शिखर के आकार की हैं। 

सामग्री का उपयोग: 

  • स्थानीय रूप से उपलब्ध निर्माण सामग्री का उपयोग भी स्थानीय प्रभाव को दर्शाता है, जैसे बांग्लादेश में अतिया मस्जिद का निर्माण ईंटों से किया गया था, और कश्मीर में शाहहमदान मस्जिद लकड़ी की स्थापत्य कला का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। 

निष्कर्ष: 

  • यह मिश्रण दर्शाता है कि इस्लाम के प्रसार के साथ, स्थानीय शैलियों को धार्मिक आवश्यकताओं के साथ जोड़ा गया, जिससे एक अद्वितीय मिश्रित वास्तुकला का जन्म हुआ। 

प्रश्न 3. बे शरिया और बा शरिया सूफी परंपरा के बीच एकरूपता और अंतर, दोनों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर - 
 बे शरिया सूफी वे हैं जो शरियत के बाहरी नियमों से अधिक आंतरिक आध्यात्मिकता को महत्व देते हैं, जबकि बा शरिया सूफी शरियत के नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए आध्यात्मिक साधना करते हैं। 

एकरूपताएँ:
  • दोनों परंपराएँ एकेश्वरवाद में विश्वास करती हैं, यानी अल्लाह एक है. 
  • दोनों अल्लाह के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण पर बल देते थे. 
  • दोनों में पीर या गुरु को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता था. 
  • दोनों वैराग्य और सांसारिक इच्छाओं के त्याग पर बल देते थे. 
  • दोनों का अंतिम लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति था. 
अंतर:
  • शरिया का पालन: बा-शरिया सूफी इस्लामी कानून (शरिया) का कड़ाई से पालन करते थे, जबकि बे-शरिया सूफी शरिया को अस्वीकार या संशोधित करते थे. 
  • जीवन शैली: बा-शरिया के लोग कभी-कभी शेख़ों से जुड़े रहते थे, लेकिन बे-शरिया के लोग खानकाह के शेख़ों से अलग रहते थे. 
  • आध्यात्मिक मार्ग: बे-शरिया मार्ग अधिक रहस्यमय और आंतरिक अनुभवों पर केंद्रित था, जहाँ बाहरी नियमों की तुलना में आंतरिक सत्य को महत्व दिया जाता था. 
प्रश्न 4.चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार और वीरशैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?
उत्तर-

अलवार, नयनार और वीरशैवों ने भक्ति आंदोलन के माध्यम से जाति प्रथा की आलोचना की, जिसमें उन्होंने सभी को समान मानने और जाति के भेदभाव को नकारने का संदेश दिया। अलवार और नयनार संतों ने जाति व्यवस्था और ब्राह्मणों की प्रभुता के विरुद्ध आवाज़ उठाई। उन्होंने भक्ति के मार्ग में जाति, लिंग या सामाजिक स्थिति को महत्वहीन माना। 

  1. ये संत विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आते थे, जिनमें ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान, और यहाँ तक कि 'अस्पृश्य' माने जाने वाले समुदायों के लोग भी शामिल थे, फिर भी इन सभी को समान रूप से पूजनीय माना जाता था। 
  2. उनकी रचनाओं, जैसे अलवारों का मुख्य काव्य संकलन 'नलयिरादिव्यप्रबन्धम्', को संस्कृत वेदों के समान ही महत्त्वपूर्ण बताया गया, जिससे ब्राह्मणवादी मान्यताओं को चुनौती मिली। 
  3. उन्होंने अपनी यात्राओं के दौरान अपने इष्ट की स्तुति में भजन गाए, जो सभी के लिए सुलभ थे, जातिगत भेदभाव की निंदा करते थे और ईश्वर की प्राप्ति में जाति के महत्व को नकारते थे।
प्रश्न 5. कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ?
उत्तर 
कबीर और बाबा गुरु नानक दोनों ने ही एकेश्वरवाद, जाति-भेदभाव के खंडन, और धार्मिक आडंबरों के विरोध का उपदेश दिया। कबीर ने दोहों और भजनों के माध्यम से, जबकि गुरु नानक ने शबदों (जिन्हें रागी गाते थे) और गुरुकुल/सत्संग के माध्यम से अपने विचारों का संप्रेषण किया।
  • कबीर के मुख्य उपदेशों में ईश्वर की एकता (निराकार ब्रह्म), गुरु की महिमा, कर्मों की शुद्धता, और मूर्तिपूजा व पाखंड का विरोध शामिल था। उन्होंने सभी मनुष्यों में समानता पर बल दिया। 
  • बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेश भी एकेश्वरवाद (एक ओंकार), सभी मनुष्यों की समानता, सेवा, सच्चाई से जीवन जीने (किरत करो), और अपनी कमाई साझा करने (वंड छको) पर केंद्रित थे। उन्होंने भी औपचारिक स्नान, बलिदान और मूर्ति पूजा जैसी धार्मिक प्रथाओं की आलोचना की।  
  • कबीर ने अपने दोहों और साखियों के माध्यम से जनसामान्य तक अपने विचार पहुँचाए, जो सरल भाषा में थे। गुरु नानक ने अपने विचारों को 'शबद' के माध्यम से सामने रखा, जिन्हें उनके साथी मरदाना जैसे रागी अलग-अलग रागों में गाते थे。 उन्होंने अपने संदेशों को फैलाने के लिए यात्राएँ (उदासियाँ) भी कीं और 'संगत' (सामूहिक प्रार्थना/बैठक) की स्थापना की। 
प्रश्न 6. सूफ़ी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर 
सूफ़ी मत के मुख्य विश्वासों और आचारों में एकेश्वरवाद, ईश्वर से प्रेम, भक्ति, गुरु का महत्व, ध्यान और मानवता की सेवा शामिल है।
सूफ़ी मत इस्लाम का एक रहस्यवादी और आध्यात्मिक मार्ग है, जो प्रेम, भक्ति और ईश्वर के साथ एकता पर जोर देता है। इसके मुख्य धार्मिक विश्वास और आचार निम्नलिखित हैं: 
एकेश्वरवाद और ईश्वर से प्रेम: 
  • सूफ़ी संत एकेश्वरवाद में विश्वास करते थे और मानते थे कि ईश्वर एक है और सर्वव्यापी है। वे ईश्वर को 'प्रियतमा' के समान मानते थे, जिनके लिए 'प्रेमी' अपना सब कुछ न्योछावर कर देता था।
आंतरिक भक्ति और रहस्यवाद: 
  • सूफ़ियों ने कुरान की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की और ईश्वर की भक्ति और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर मुक्ति पाने पर जोर दिया। वे आत्मा के परमात्मा में लीन हो जाने की संभावना पर विश्वास करते थे, जिसे 'मारिफ़ात' या 'वस्ल' (एकीकरण) कहते हैं। 
गुरु का महत्व: 
  • सूफ़ी साधना में गुरु या पीर का बहुत महत्व है, जो शिष्यों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देते हैं और उन्हें ईश्वर के निकट लाने का प्रयास करते हैं। 
आचार और व्यवहार: 
  • सूफ़ियों ने सदाचारिता, इंसानों के प्रति दयालुता, प्रेम, करुणा और भाईचारे पर जोर दिया। उनका मानना था कि ईश्वर की सेवा करने का सबसे अच्छा तरीका मानवता की सेवा करना है। 
साधना के तरीके: 
  • मन को प्रशिक्षित करने के लिए वे 'ज़िक्र' (ईश्वर का नाम जपना), 'चिंतन', 'समा' (आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल), और सांस पर नियंत्रण जैसी क्रियाओं को अच्छा मानते थे। 
प्रश्न 7 . क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफ़ी संतों से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया?
शासकों ने नयनार और सूफी संतों से संबंध बनाने का प्रयास अपनी लोकप्रियता बढ़ाने, राजनीतिक स्थिरता के लिए समर्थन पाने और अपनी सत्ता को धार्मिक वैधता प्रदान करने के उद्देश्य से किया। 
  • क्यों (Why):
    • लोकप्रियता और सामाजिक समरसता: ये संत समाज के विभिन्न वर्गों में अत्यंत लोकप्रिय थे। उनके संपर्क में आकर, शासक जनता के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ा सकते थे और सामाजिक शांति बनाए रख सकते थे।
    • धार्मिक समर्थन और वैधता: इन संतों का धर्म पर गहरा प्रभाव था। शासकों ने उनके माध्यम से धार्मिक समर्थन प्राप्त किया, जिससे उनकी सत्ता को ईश्वरीय या आध्यात्मिक वैधता मिली।
    • राजनीतिक स्थिरता: संतों के साथ अच्छे संबंध शासकों को राजनीतिक विरोध को कम करने और स्थिरता बनाए रखने में मदद करते थे।
  • किस तरह (How):
    • संरक्षण और अनुदान: सुल्तानों ने सूफी संतों को कर-मुक्त भूमि और दान दिए, जिसका उपयोग वे परोपकारी कार्यों के लिए करते थे।
    • मंदिर निर्माण और उत्सव: चोल राजाओं ने भव्य शिव मंदिरों का निर्माण कराया, पत्थर और धातु से अपनी और नयनार संतों की मूर्तियाँ स्थापित कराईं, और तमिल भजनों के गाने की परंपरा को बढ़ावा दिया।
    • कब्रें दरगाहों के पास: कई शासक सूफी दरगाहों और खानकाहों के पास अपनी कब्रें बनवाते थे, ताकि आध्यात्मिक प्रभाव का लाभ मिल सके।
प्रश्न 8 . उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफ़ी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया?
उत्तर : भक्ति और सूफी विचारकों ने आम लोगों तक अपने विचार पहुँचाने के लिए विभिन्न स्थानीय भाषाओं का प्रयोग किया। 
आम लोगों तक पहुंच: वे चाहते थे कि उनके विचार व्यापक जनसमूह तक पहुंचें, जो अक्सर संस्कृत या फ़ारसी जैसी दरबारी भाषाओं को नहीं समझते थे। 
स्थानीय भाषाओं का प्रयोग: उन्होंने स्थानीय बोलियों और भाषाओं को अपनाया ताकि संदेश तेज़ी से फैले और स्थानीय लोगों द्वारा स्वीकार किया जा सके। 
        उदाहरण (भक्ति):
    • तमिलनाडु के अलवर और नयनार संतों ने अपने देवताओं की स्तुति में तमिल भाषा का प्रयोग किया।
    • वीरशैव परंपरा में, आंदोलन से जुड़े लोगों ने कन्नड़ में "वचन" (कहावतें) रचीं. 
    • महाराष्ट्र के संतों ने मराठी में प्रचार किया. 
  • उदाहरण (सूफी):
    •  चिश्ती सिलसिले के संत दिल्ली में बातचीत के लिए आम लोगों की भाषा "हिंदवी" का उपयोग करते थे.
    • बाबा फ़रीद जैसे अन्य सूफ़ियों ने स्थानीय भाषाओं में पद्य रचे, जिन्हें बाद में गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया गया. 
    • दखनी (उर्दू का एक रूप) में कर्नाटक के बीजापुर में कविताएँ रची गईं, जिन्हें महिलाएँ घरेलू काम करते समय गाती थीं. 
    • मलिक मुहम्मद जायसी ने मानवीय प्रेम को रूपक के रूप में प्रयोग करते हुए ईश्वरीय प्रेम के विचारों को अवधी भाषा में "पद्मावत" जैसी मसनवी (लंबी कविताएं) के माध्यम से व्यक्त किया. 
प्रश्न 9   इस अध्याय में प्रयुक्त पाँच स्त्रोत और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचार
स्त्रोत का नामसामाजिक विचारधार्मिक विचार
1. कबीर के दोहेजाति-पाँति की निषेध, सामाजिक समानताईश्वर की एकता, साधना और प्रेम
2. मियां मीर की रचनाएँसमुदायों के बीच सद्भाव, प्रेमसूफ़ी एकेश्वरवाद, ध्यान और प्रेम
3. नयनार भक्ति गीतसमाज में शोषण के विरुद्ध विरोधभगवान् शिव की आराधना और भक्ति
4. अरबी-फ़ारसी सूफ़ी ग्रंथसहिष्णुता और विभिन्नता में एकतासूफ़ी तपस्या, ईश्वर की खोज
5. भक्ति आंदोलन के साहित्यसमाज सुधार, जातिगत भेद मिटाने का प्रयासभगवान के प्रेम में समर्पण

इन स्त्रोतों से पता चलता है कि सामाजिक समानता, जातिगत भेद को कम करना, और धार्मिक एकता जैसे विचार प्रमुख थे। भक्ति और सूफ़ी दोनों आंदोलनों ने लोगों के बीच प्रेम, करुणा और सहिष्णुता का संदेश दिया।


प्रश्न 10 भारत के एक मानचित्र पर, 3 सूफ़ी स्थल और 3 वे स्थल जो मंदिरों (विष्णु, शिव तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर) से संबद्ध हैं, निर्दिष्ट कीजिए।

भारत के मानचित्र पर निर्दिष्ट किए जाने वाले स्थल निम्नलिखित हैं: 

  • 3 सूफ़ी स्थल:
    • अजमेर शरीफ़ दरगाह (ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह): अजमेर, राजस्थान
    • निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह: दिल्ली
    • शेख सलीम चिश्ती की दरगाह: फ़तेहपुर सीकरी, उत्तर प्रदेश
  • 3 मंदिर स्थल:
    • विष्णु मंदिर (चार धाम में से एक): बद्रीनाथ मंदिर, बद्रीनाथ, उत्तराखंड
    • शिव मंदिर (ज्योतिर्लिंग में से एक): काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
    • देवी मंदिर (शक्तिपीठ में से एक): कामाख्या मंदिर, गुवाहाटी, असम






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